Sankata Devi, 8 Names ,Vrat Katha, Pujan, Vrat Vidhi, Aarti

Sankata Mata Pujan Samagri

संकटा माता की मूर्ति

 लाल वस्त्र  ( एक चौकी पर बिछाने के लिये )

धूप

दीप

घी

उड़हुल अथवा लाल फूल

पुष्पमाला

नैवेद्य(चावल का चूरा बनाकर ,उसमें घी तथा शक्कर मिलायें और लड्डु बनायें)

ऋतुफल(केला,संतरा,नारियल )

सिंदूर

Sankata Manta Pujan Vidhi

प्रात:काल नित्य क्रम कर स्नान कर लें। स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा घर को स्वच्छ कर लें। एक पटरे अथवा चौकी पर लाल वस्त्र बिछायें। उस पर संकटा माता की मूर्ति अथवा चित्र स्थापित करें। एक कलश में जल भर कर रखें। अब संकटा माता की पूजा करें। धूप-दीप दिखायें। नैवेद्य का भोग लगायें। दोनों हाथ जोड़कर संकटा माता का ध्यान करें और इस प्रकार कहें-

“दस भुजाओं तथा तीन नेत्रों से सुशोभित गुणमयी, लाल वर्णवाली, शुभ्रांगी, शीघ्रही संकटनाशिने, शुद्ध स्फटिक की माला, जलपूर्ण कलश, कमल, पुष्प, शंख, चक्र, गदा, त्रिशूल, डमरू तथा तलवार आदि से शोभाग्यमान भगवती संकटा का मैं ध्यान करता हूँ।” 

इसके बाद कथा सुने अथवा सुनायें। कथा पूर्ण होने के बाद आरती करें और प्रसाद वितरित करें। शाम होने पर अपना उपवास खोले। भोजन में केवल मीठी वस्तुयें ही ग्रहण करें।

The eight names Sankata Devi

सङ्कटा प्रथमं नाम द्वितीयं विजया तथा |

तृतीयं कामदा प्रोक्तं चतुर्थं दुःखहारिणी ||
शर्वाणी पञ्चमं नाम षष्ठं कात्यायनी तथा |

सप्तमं भीमनयना सर्वरोगहराऽष्टमम् ||
नामाष्टकमिदं पुण्यं त्रिसन्ध्यं श्रद्धयान्वितः |

यः पठेत्पाठयेद्वापि नरो मुच्येत सङ्कटात्||

1) संकटा

2) विजया

3) कामदा

4) दुखहारिणी

5) शर्वाणी

6) कात्यायनी

7)भीमनयना

8) सर्वरोगहरा

संकटा माता की आरती Sankata Mata Aarti

जय जय संकटा भवानी करहूं आरती तेरी।
शरण पड़ी हूँ तेरी माता,अरज सुनहूं अब मेरी॥
॥जय-जय संकटा .. ॥
नहिं कोउ तुम समान जग दाता,सुर-नर-मुनि सब टेरी।
कष्ट निवारण करहु हमारा,लावहु तनिक न देरी॥
॥जय-जय संकटा .. ॥
काम-क्रोध अरु लोभन के वश,पापहि किया घनेरी।
सो अपराधन उर में आनहु,छमहु भूल बहु मेरी॥
॥जय-जय संकटा .. ॥
हरहु सकल सन्ताप हृदय का,ममता मोह निबेरी।
सिंहासन पर आज बिराजें,चंवर ढ़ुरै सिर छत्र-छतेरी॥
॥जय-जय संकटा .. ॥
खप्पर,खड्ग हाथ में धारे,वह शोभा नहिं कहत बनेरी॥
ब्रह्मादिक सुर पार न पाये,हारि थके हिय हेरी॥
॥जय-जय संकटा .. ॥
असुरन्ह का वध किन्हा,प्रकटेउ अमत दिलेरी।
संतन को सुख दियो सदा ही,टेर सुनत नहिं कियो अबेरी॥
॥जय-जय संकटा .. ॥
गावत गुण-गुण निज हो तेरी,बजत दुंदुभी भेरी।
अस निज जानि शरण में आयऊं,टेहि कर फल नहीं कहत बनेरी॥
॥जय-जय संकटा .. ॥
भव बंधन में सो नहिं आवै,निशदिन ध्यान धरीरी॥
॥जय-जय संकटा .. ॥

Pausha Putrada Ekadashi Vrat

अथ श्री शनिकवचम्