Shiva Pujan and Bilpatra importance in Shiva Worship

Shiva Pujan and Bilpatra importance in Shiva Worship

Shiva Pujan and Bilpatra importance in Shiva Worship शिवपूजन और बिल्वपत्र का महत्व, दुर्लभ व चमत्कारी बेलपत्र, बिल्वपत्र तोड़ने के नियम, बिल्वपत्र अर्पित करने का मन्त्र

त्रिदलं त्रिगुणाकारं त्रिनेत्रं च त्रयायुधम्।
त्रिजन्मपापसंहारं बिल्वपत्रं शिवार्पणम्॥

अर्थात् तीन दल वाला, सत्त्व, रज एवं तम:स्वरूप, सूर्य-चन्द्र-अग्नि–त्रिनेत्ररूप और आयुधत्रय स्वरूप तथा तीनों जन्मों के पापों को नष्ट करने वाला बिल्वपत्र मैं भगवान शिव को समर्पित करता हूँ।

बिल्वपत्र (बेलपत्र) से ही शिवपूजन की पूर्णता

मनुष्य जन्म दुर्लभ है, जिसका मुख्य लक्ष्य है मोक्ष की प्राप्ति। इसका मुख्य साधन है ज्ञान जो भगवान शिव की उपासना से प्राप्त होता है। शिवजी की आराधना केवल जल व पत्र-पुष्प से ही हो जाती है। इनमें प्रमुख है बिल्वपत्र।
समुद्र-मंथन से उत्पन्न हलाहल-विष की ज्वाला से दग्ध त्रिलोकी की रक्षा के लिए भूतभावन भगवान शिव ने स्वयं ही उस महागरल का हथेली पर रखकर आचमन कर लिया और नीलकण्ठ कहलाए। उस विष की अग्नि को शांत करने के लिए भगवान शिव पर ठंडी वस्तुएं चढ़ाई जाती हैं; जैसे–जल, गंगाजल, दूध, बेलपत्र गुलाबजल, आदि। इससे भगवान शिव का मस्तक शीतल रहता है। शिवपुराण में कहा गया है कि यदि पूजन में अन्य कोई वस्तु उपलब्ध न हो तो बिल्वपत्र ही समर्पित कर देने चाहिए। शिवजी को बिल्वपत्र अर्पित करने से ही पूजा सफल और सम्पूर्णता को प्राप्त होती है।

भगवान शिव को शीघ्र प्रसन्न करने के लिए अपनाएं ये उपाय

भगवान शिव को शीघ्र प्रसन्न करने के लिए बिल्वपत्र के तीनों दलों पर लाल चंदन से या कुंकुम से ‘राम’ लिखकर या ‘ॐ नम: शिवाय’ लिखकर अर्पण करना चाहिए। शिवपूजन में संख्या का बहुत महत्व होता है। अत: विशेष अवसरों पर जैसे शिवरात्रि, श्रावण के सोमवार, प्रदोष आदि को ११, २१, ३१, १०८ या १००८ बिल्वपत्र शिवलिंग पर अर्पित किए जा सकते हैं।

मनोकामनापूर्ति, संकटनाश व सुख-सम्पत्ति के लिए इस मन्त्र के साथ चढ़ाएं बेलपत्र

भालचन्द्र मद भरे चक्ष, शिव कैलास निवास,
भूतनाथ जय उमापति पूरी मो अभिलाष।
शिव समान दाता नहीं, विपति विदारन हार,
लज्जा मेरी राखियो सुख सम्पत्ति दातार॥

बिल्वपत्र अर्पित करने का मन्त्र

भगवान शिव को बिल्वपत्र कई प्रकार के मन्त्र बोलते हुए अर्पित किया जा सकता है–
नमो बिल्मिने च कवचिने च नर्मो वर्मिणे च वरूथिने च।
नम: श्रुताय च श्रुतसेनाय च नमो दुन्दुभ्याय चाहनन्याय च॥
श्रीसाम्बशिवाय नम:। बिल्वपत्राणि समर्पयामि।
अथवा
त्रिदलं त्रिगुणाकारं त्रिनेत्रं च त्रिधायुतम्।
त्रिजन्मपापसंहारं बिल्वपत्रं शिवार्पणम्।।
अथवा
“ॐ नम: शिवाय” इस मन्त्र का उच्चारण करते हुए शिवलिंग पर बिल्वपत्र समर्पित किए जा सकते हैं। मन्त्र बोलने में असमर्थ हैं तो केवल ‘शिव’ ‘शिव’ कहकर भी बेलपत्र अर्पित कर सकते हैं।

शिवपूजा के लिए बेलपत्र चयन करते समय रखें इन बातों का ध्यान
शिवपूजा में बिल्वपत्र चढ़ाते समय कई बातों का ध्यान रखना चाहिए

बेलपत्र छिद्ररहित होना चाहिए।
तीन पत्ते वाले, कोमल, अखण्ड बिल्वपत्रों से भगवान शिव की पूजा करनी चाहिए।
बिल्वपत्र में चक्र व वज्र नहीं होने चाहिए। बिल्वपत्रों में जो सफेद लगा रहता है उसे चक्र कहते हैं और डण्ठल में जो गांठ होती है उसे वज्र कहते है।
बेलपत्र धोकर मिट्टी आदि साफ कर शिवजी पर अर्पित करने चाहिए।
जिन तिथियों में बेलपत्र तोड़ने की मनाही है, उस समय बासी व सूखे बेलपत्र भगवान शिव को अर्पित कर सकते हैं।
बिल्वपत्र सदैव अधोमुख (उल्टा) चढ़ाना चाहिए। इसका चिकना भाग नीचे की तरफ रहना चाहिए।

बिल्वपत्र तोड़ने के नियम

अमृतोद्भव श्रीवृक्ष महादेव प्रिय: सदा।
गृह्णामि तव पत्राणि शिवपूजार्थमादरात्॥
———– (आचारेन्दु)
चतुर्थी, अष्टमी, नवमी, चतुर्दशी और अमावस्या तिथि को, संक्रान्ति व सोमवार को बेलपत्र नहीं तोड़ने चाहिए। किन्तु बेलपत्र शंकरजी को बहुत प्रिय हैं अत: इन तिथियों में पहले दिन का रखा हुआ बेलपत्र चढ़ाना चाहिए। यदि नए बेलपत्र न मिलें तो चढ़ाए हुए बेलपत्र को ही धोकर बार-बार चढ़ाया जा सकता है।

दुर्लभ व चमत्कारी बेलपत्र

जिस तरह रुद्राक्ष कई मुखों वाले होते हैं, उसी तरह बिल्वपत्र भी कई पत्तियों वाले होते हैं। बिल्वपत्र में जितनी अधिक पत्तियां होती हैं, वह उतना ही अधिक उत्तम माना जाता है। तीन पत्तियों से अधिक पत्ते वाले बेलपत्र अत्यन्त पवित्र माने गये हैं। चार पत्ती वाला बिल्वपत्र ब्रह्मा का रूप माना जाता है। पांच पत्ती वाला बेलपत्र शिवस्वरूप होता है व शिवकृपा से ही कभी-कभी प्राप्त होता है। छह से लेकर इक्कीस पत्तियों वाले बिल्वपत्र मुख्यतः नेपाल में पाए जाते हैं। इनका प्राप्त होना तो अत्यन्त ही दुर्लभ है।

बिल्वपत्र की महिमा

बिल्ववृक्ष साक्षात् शंकररूप है। ब्रह्मा आदि देवता शक्ति प्राप्त करने के लिए बिल्ववृक्ष के नीचे आकर बैठते हैं। आशुतोष शिव को बिल्वपत्र कितना प्रिय है, इसका अनुमान इस कथानक से लगाया जा सकता है–एक व्याध (बहेलिया) शिकार के लिए वन में गया। शिकार कर लौटते समय थकान के कारण एक वृक्ष के नीचे सो गया। जागने पर उसने देखा कि रात्रि के घोर अंधकार के कारण घर लौटना असंभव है, अत: जंगली जानवरों के भय से वह एक वृक्ष के ऊपर जाकर बैठ गया। भाग्यवश उसदिन शिवरात्रि थी और जिस वृक्ष पर वह बैठा था, वह बिल्ववृक्ष था जिसकी जड़ में अति प्राचीन शिवलिंग था। सुबह शिकार के लिए जल्दी निकलने के कारण उसने कुछ खाया-पिया नहीं था। इससे उसका स्वाभाविक ही उपवास हो गया। सोने पर सुहागा तब हुआ जब वसन्त की रात्रि में ओस की बूंदों से भीगा एक बिल्वपत्र उसके अंगों से लगकर उस शिवलिंग पर जा गिरा। इससे आशुतोष शिव के तोष का पारावार न रहा। फलत: जीवन भर हिंसक कर्म करने के बावजूद उस व्याध को शिवलोक की प्राप्ति हुई।

बेलपत्रों द्वारा शिवजी का पूजन सभी कामनाओं की पूर्ति करने वाला और सम्पूर्ण दरिद्रता का नाश करने वाला है। बेलपत्र चढ़ाने का वही फल है जो एक कमलपुष्प चढ़ाने का है। बेलपत्र से बढ़कर शिवजी को प्रसन्न करने वाली दूसरी कोई वस्तु नहीं है।
जो मनुष्य “ॐ नम: शिवाय” इस पंचाक्षर मन्त्र से अखण्ड बेलपत्रों द्वारा भगवान शिव का पूजन करता है, वह इस लोक में ऐश्वर्यवान होकर अंत में शिवलोक को प्राप्त होता है।
बिल्ववृक्ष के दर्शन, स्पर्श और वंदन से मनुष्य सभी पापों से मुक्त हो जाता है।
अंत समय में मनुष्य के सारे शरीर में बिल्ववृक्ष के मूल की मिट्टी लगा देने से व्यक्ति परमगति प्राप्त करता है।
कृष्णपक्ष की अष्टमी को अखण्ड बेलपत्रों से भगवान शिव की पूजा करने पर ब्रह्महत्यादि पापों से छुटकारा मिल जाता है।
बेलवृक्ष के नीचे बैठकर जो मनुष्य मंत्रजाप करता है, वह पुरश्चरण का (सवा लाख का) फल प्राप्त करता है और उसे लक्ष्मी की प्राप्ति होती है।
बिल्ववृक्ष के मूल में जो मनुष्य दीपमालिका जलाता है वह तत्त्वज्ञान से पूर्ण (ज्ञानी) हो जाता है।
बिल्ववृक्ष के मूल में किसी शिवभक्त को भोजन कराने से करोड़ों मनुष्यों को भोजन कराने का फल मिलता है।

विष्णुप्रिया लक्ष्मीजी के वक्ष:स्थल से प्रादुर्भूत हुआ बिल्ववृक्ष
लक्ष्म्या: स्तनत उत्पन्नं महादेवस्य च प्रियम्।
बिल्ववृक्षं प्रयच्छामि बिल्वपत्रं शिवार्पणम्॥
अर्थात् बिल्ववृक्ष महालक्ष्मीजी के वक्ष:स्थल से उत्पन्न हुआ और महादेवजी का प्रिय है, मैं एक बिल्वपत्र शिवार्पण करता हूँ।

वृहद् धर्मपुराण में बिल्ववृक्ष की उत्पत्ति सम्बधी कथा

इसके अनुसार बिल्ववृक्ष की उत्पत्ति लक्ष्मीजी द्वारा स्तन काटकर चढ़ाने से हुई। लक्ष्मीजी ने भगवान विष्णु को पतिरूप में प्राप्त करने के लिए शिवजी का घोर आराधन व तप किया। अंत में लक्ष्मीजी “ॐ नम: शिवाय” इस पंचाक्षर मन्त्र से एक सहस्त्र कमलपुष्प द्वारा शिवजी का पूजन कर रहीं थीं, तब शिवजी ने उनकी परीक्षा करने के लिए एक कमलपुष्प चुरा लिया। भगवान विष्णु ने जब एक सहस्त्र पुष्पों से शिवजी की अर्चना की थी, उस समय भी भगवान शिवजी ने एक कमल चुरा लिया था –
सहस्त्र कमल पूजा उर धारी,
कीन्ह परीक्षा तबहि पुरारी।
एक कमल प्रभु राखेहु जोई,
कमल नयन पूजन चह सोई।
कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर,
भए प्रसन्न दीन्ह इच्छित वर।

लक्ष्मीजी ने एक कमलपुष्प कम होने पर अपना बायां वक्ष:स्थल काटकर शिवजी पर चढ़ा दिया, क्योंकि स्तन की उपमा कमल से की जाती है। जब लक्ष्मीजी अपना दायां वक्ष:स्थल भी काटने को उद्यत हुईं, तब शिवजी प्रकट हो गए और लक्ष्मीजी से बोले – “तुम ऐसा मत करो, तुम समुद्र-तनया हो।”

भगवान शिव आदि शल्यचिकित्सक हैं, उन्होंने गणेशजी को हाथी का और दक्षप्रजापति को बकरे का मुख लगाया था। अत: शिवकृपा से लक्ष्मीजी का बायां स्तन ज्यों-का-त्यों हो गया। शिवजी ने लक्ष्मीजी को वर देते हुए कहा – ’समुद्र-तनये! तुम्हारा मनोरथ पूर्ण होगा। भगवान विष्णु तुम्हारा वरण करेंगे।” लक्ष्मीजी ने कटे हुए स्तन को पृथ्वी में गाड़ दिया, जिससे एक वृक्ष उत्पन्न हुआ। जिसके पत्तों में तीन दल हैं व गोल फल लगता है। बिल्वफल को ब्रह्मा, विष्णु व महेश भी न पहचान सके। यह वृक्ष व इसका फल ब्रह्माजी की सृष्टि से परे है। वैशाख शुक्ल पक्ष की तृतीया ‘अक्षय तृतीया’ को बिल्ववृक्ष की उत्पत्ति हुई।

भगवान शिव ने प्रसन्न होकर लक्ष्मीजी से कहा – “बिल्ववृक्ष तुम्हारी भक्ति का प्रतीक होगा। यह वृक्ष मुझे व लक्ष्मीजी को अत्यन्त प्रिय होगा। हम दोनों की बिल्ववृक्ष से की गयी पूजा मुक्ता, प्रवाल, मूंगा, स्वर्ण, चांदी आदि रत्नों से की गयी पूजा से श्रेष्ठ मानी जाएगी। जैसे गंगाजल मुझको प्रिय है, उसी प्रकार बिल्वपत्र और बिल्वफल द्वारा की गयी मेरी पूजा कमल के समान मुझे प्रिय होगी। बिना बिल्वपत्र के मैं कोई भी वस्तु ग्रहण नहीं करूँगा।’

मणिमुक्त्ता प्रवालैस्तु रत्नैरप्यर्चनंकृतम्।
नगृहणामि बिना देवि बिल्वपत्रैर्वरानने॥
———-(लिंगपुराण)

अग्निपुराण में बिल्ववृक्ष की उत्पत्ति सम्बधी कथा
महर्षि भृगु की जो धेनु है, वही पृथ्वी पर गौ रूप में प्रकट हुई। उसी के गोबर से बिल्ववृक्ष की उत्पत्ति हुई। उस बिल्ववृक्ष से ही श्री उत्पन्न हुईं। इसलिए बिल्वफल को श्रीफल भी कहा जाता है। श्रीलक्ष्मीजी की तपस्या के फलस्वरूप बिल्ववृक्ष हुआ।

आदित्यवर्णे तपसोऽधि जातो वनस्पतिस्तव वृक्षोऽक्ष बिल्वः।
तस्य फलानि तपसा नुदन्तु या अन्तरा याश्च बाह्या अलक्ष्मीः॥६॥
———-(श्रीसूक्त, ऋग्वेद)

हे, सूर्य के समान कान्ति वाली माँ लक्ष्मी! वृक्षों में श्रेष्ठ मंगलमय बिना फूल के फल देने वाला बिल्ववृक्ष तुम्हारे ही तप से उत्पन्न हुआ। उस बिल्व वृक्ष के फल हमारे बाहरी और भीतरी (मन व संसार के) दारिद्रय को दूर करें।।

 

Ganesh Chauth 2018

Ganesh Chauth 2018

गणेश चतुर्थी पूजन सरल विधि

*गणेश चतुर्थी गणेश जी का जन्म दिन है। गणेश जी का जन्म भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को हुआ था।*

गणेश जी बुद्धि, सौभाग्य, समृद्धि, ऋद्धि सिद्धि देने वाले तथा विघ्नहर्ता यानि संकट दूर करने वाले माने जाते है । विनायक, गजानन, लम्बोदर, गणपति आदि सब गणेश जी के ही नाम है।

सफलता या लक्ष्य प्राप्त करने के लिए सम्पूर्ण ज्ञान हासिल करना, अपनी त्वरित बुद्धि से विवेकपूर्ण निर्णय करना, लगातार मेहनत और प्रयास करते रहना, जरुरी होते है । इसी वजह से गणेश जी को सबसे पहले पूजा जाता है।

ग्यारवें दिन किसी जलाशय, नदी या समुद्र में मूर्ती को विसर्जित किया जाता है। गाजे बाजे के साथ नाचते गाते लोग गणेश विसर्जन में हिस्सा लेते है। हर तरफ “गणपति बाप्पा मोर्या” जैसे शब्द गूंजते नजर आते है।

 

*गणेश चतुर्थी के एक दिन पहले कई जगह मंदिरों में सिंजारा मनाया जाता है जिसमे गणेश जी को मेहंदी अर्पित की जाती है।* महिलाएं भजन गाती है। प्रसाद आदि वितरित किये जाते है।

*इस दिन चाँद को देखना अशुभ माना जाता है। कहते है चाँद को गणेश जी का श्राप लगा हुआ है। इस दिन चाँद को देखने से झूठा कलंक लग सकता है।*

*भगवान श्री कृष्ण को भी चाँद देखने पर मणि चोरी के झूठे कलंक का सामना करना पड़ा था। ये धार्मिक मान्यताएं है।*

*गणेश जी का पूजन करने की सामग्री:–*

१. चौकी या पाटा
२. जल कलश
३. लाल कपड़ा
४. पंचामृत
५. रोली, मोली, लाल चन्दन
६. जनेऊ
७. गंगाजल
८. सिन्दूर
९. चांदी का वर्क
१०. लाल फूल या माला
११. इत्र
१२. मोदक या लडडू
१३. धानी
१४. सुपारी
१५ लौंग
१६. इलायची
१७. नारियल
१८. फल
१९. दूर्वा – दूब
२०. पंचमेवा
२१. घी का दीपक
२२. धूप, अगरबत्ती
२३. कपूर

Ganesh Chauth 2018 Pujan VIdhi

गणेश पूजन की विधि

सुबह नहा धोकर *शुद्ध लाल रंग के कपड़े पहने। गणेश जी को लाल रंग प्रिय है।*

*पूजा करते समय आपका मुँह पूर्व दिशा में या उत्तर दिशा में होना चाहिए।*

१. सबसे पहले गणेश जी को पंचामृत से स्नान कराएं ।

२. उसके बाद गंगा जल से स्नान कराएं ।

३. गणेश जी को चौकी पर लाल कपड़े पर बिठाएं।

४. ऋद्धि सिद्धि के रूप में दो सुपारी रखें।

५. गणेश जी को *सिन्दूर लगाकर चांदी का वर्क लगाएं।*

६. लाल चन्दन का टीका लगाएं।

७. अक्षत (चावल) लगाएं।

८. *मौली और जनेऊ* अर्पित करें।

९. लाल रंग के पुष्प या माला आदि अर्पित करें।

१०. इत्र अर्पित करें।

११. दूर्वा अर्पित करें।

१२. नारियल चढ़ाएं।

१३. पंचमेवा चढ़ाए।

१४. फल अर्पित करेँ।

१५. मोदक और लडडू आदि का भोग लगाएं।

१६. लौंग इलायची अर्पित करें।

१७. दीपक, अगरबत्ती, धूप आदि जलाएं।

१८. गणेश मन्त्र उच्चारित करें:–

*ऊँ वक्रतुण्ड़ महाकाय सूर्य कोटि समप्रभ । निर्विघ्नं कुरू मे देव, सर्व कार्येषु सर्वदा ।।*

१९. कपूर जलाकर आरती करें। गणेश जी की आरती गाएँ।

जय गणेशाय नमः

 

ट्रांसफर रुकवाने के उपाय

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Pitru Paksha 2018 Pitru Paksha 2019 Pitru Paksha 2020 Dates

Pitru Paksha 2018 Pitru Paksha 2019 Pitru Paksha 2020 Dates

Pitru Paksha 2018

24September(Monday)Purnima Shraddha
25September(Tuesday)Pratipada Shraddha
26September(Wednesday)Dwitiya Shraddha
27September(Thursday)Tritiya Shraddha
28September(Friday)Maha Bharani, Chaturthi Shraddha
29September(Saturday)Panchami Shraddha
30September(Sunday)Shashthi Shraddha
01October(Monday)Saptami Shraddha
02October(Tuesday)Ashtami Shraddha
03October(Wednesday)Navami Shraddha
04October(Thursday)Dashami Shraddha
05October(Friday)Ekadashi Shraddha
06October(Saturday)Magha Shraddha, Dwadashi Shraddha
07October(Sunday)Trayodashi Shraddha, Chaturdashi Shraddha
08October(Monday)Sarva Pitru Amavasya

 

pitru paksh 2018

pitru paksh 2018

Pitru Paksha 2019 Dates

13September(Friday)Purnima Shraddha
14September(Saturday)Pratipada Shraddha
15September(Sunday)Dwitiya Shraddha
17September(Tuesday)Tritiya Shraddha
18September(Wednesday)Maha Bharani, Chaturthi Shraddha
19September(Thursday)Panchami Shraddha
20September(Friday)Shashthi Shraddha
21September(Saturday)Saptami Shraddha
22September(Sunday)Ashtami Shraddha
23September(Monday)Navami Shraddha
24September(Tuesday)Dashami Shraddha
25September(Wednesday)Ekadashi Shraddha, Dwadashi Shraddha
26September(Thursday)Magha Shraddha, Trayodashi Shraddha
27September(Friday)Chaturdashi Shraddha
28September(Saturday)Sarva Pitru Amavasya

 

Pitru Paksha 2020 Dates

01September(Tuesday)Purnima Shraddha
02September(Wednesday)Pratipada Shraddha
03September(Thursday)Dwitiya Shraddha
05September(Saturday)Tritiya Shraddha
06September(Sunday)Chaturthi Shraddha
07September(Monday)Maha Bharani, Panchami Shraddha
08September(Tuesday)Shashthi Shraddha
09September(Wednesday)Saptami Shraddha
10September(Thursday)Ashtami Shraddha
11September(Friday)Navami Shraddha
12September(Saturday)Dashami Shraddha
13September(Sunday)Ekadashi Shraddha
14September(Monday)Dwadashi Shraddha
15September(Tuesday)Magha Shraddha, Trayodashi Shraddha
16September(Wednesday)Chaturdashi Shraddha
17September(Thursday)Sarva Pitru Amavasya

 

पहला श्राद्ध : 24 सितंबर 2018, सोमवार को

तिथि – पूर्णिमा, जिनकी मृत्यु पूर्णिमा तिथि को हुई हो, उनका श्राद्ध पितृ पक्ष के पहले दिन होता है.

श्राद्ध करने का सही समय

कुतुप मुहूर्त : 11:48 से 12:36 तक
रौहिण मुहूर्त : 12:36 से 13:24 तक
अपराह्न काल : 13:24 से 15:48 तक

महालय अमावस्या 
पितृ पक्ष के सबसे आखिरी दिन को महालय अमावस्या के नाम से जाना जाता है. इसे सर्वपितृ अमावस्या भी कहते हैं. क्योंकि इस दिन उन सभी मृत पूर्वजों का तर्पण करवाते हैं, जिनका किसी न किसी रूप में हमारे जीवन में योगदान रहा है. इस दिन उनके प्रति आभार प्रक्रट करते हैं और उनसे अपनी गलतियों की माफी मांगते हैं. इस दिन किसी भी मृत व्यक्ति का श्राद्ध किया जा सकता है. खासतौर से वह लोग जो अपने मृत पूर्वजों की तिथि नहीं जानते, वह इस दिन तर्पण करा सकते हैं.

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Vaibhav Lakshmi Fast, Pujan, Vrat Katha, Aarti

 

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Vaibhav Lakshmi Fast, Pujan, Vrat Katha, Aarti :उद्देश्य सुख और सम्रिधि के लिए

Vaibhav Lakshmi Fast, Pujan, Vrat Katha, Aarti

शुक्रवार को लक्ष्मी देवी का भी व्रत रखा जाता है। इसे वैभवलक्ष्मी व्रत भी कहा जाता है। इस दिन स्त्री-पुरुष देवी लक्ष्मी की पूजा-अर्चना करते हुए श्वेत पुष्प, श्वेत चंदन से पूजा कर तथा चावल और खीर से भगवान को भोग लगाकर प्रसाद ग्रहण करते हैं। इस व्रत के दिन उपासक को एक समय भोजन करते हुए खीर अवश्य खानी चाहिए।

वैभवलक्ष्मी व्रतकथा Vaibhav Vrat Katha 

किसी शहर में लाखों लोग रहते थे। सभी अपने-अपने कामों में रत रहते थे। किसी को किसी की परवाह नहीं थी। भजन-कीर्तन, भक्ति-भाव, दया-माया, परोपकार जैसे संस्कार कम हो गए। शहर में बुराइयाँ बढ़ गई थीं। शराब, जुआ, रेस, व्यभिचार, चोरी-डकैती वगैरह बहुत से गुनाह शहर में होते थे। इनके बावजूद शहर में कुछ अच्छे लोग भी रहते थे।

ऐसे ही लोगों में शीला और उनके पति की गृहस्थी मानी जाती थी। शीला धार्मिक प्रकृति की और संतोषी स्वभाव वाली थी। उनका पति भी विवेकी और सुशील था। शीला और उसका पति कभी किसी की बुराई नहीं करते थे और प्रभु भजन में अच्छी तरह समय व्यतीत कर रहे थे। शहर के लोग उनकी गृहस्थी की सराहना करते थे।

देखते ही देखते समय बदल गया। शीला का पति बुरे लोगों से दोस्ती कर बैठा। अब वह जल्द से जल्द करोड़पति बनने के ख्वाब देखने लगा। इसलिए वह गलत रास्ते पर चल पड़ा फलस्वरूप वह रोडपति बन गया। यानी रास्ते पर भटकते भिखारी जैसी उसकी हालत हो गई थी।

शराब, जुआ, रेस, चरस-गाँजा वगैरह बुरी आदतों में शीला का पति भी फँस गया। दोस्तों के साथ उसे भी शराब की आदत हो गई। इस प्रकार उसने अपना सब कुछ रेस-जुए में गँवा दिया।

शीला को पति के बर्ताव से बहुत दुःख हुआ, किन्तु वह भगवान पर भरोसा कर सबकुछ सहने लगी। वह अपना अधिकांश समय प्रभु भक्ति में बिताने लगी। अचानक एक दिन दोपहर को उनके द्वार पर किसी ने दस्तक दी। शीला ने द्वार खोला तो देखा कि एक माँजी खड़ी थी। उसके चेहरे पर अलौकिक तेज निखर रहा था। उनकी आँखों में से मानो अमृत बह रहा था। उसका भव्य चेहरा करुणा और प्यार से छलक रहा था। उसको देखते ही शीला के मन में अपार शांति छा गई। शीला के रोम-रोम में आनंद छा गया। शीला उस माँजी को आदर के साथ घर में ले आई। घर में बिठाने के लिए कुछ भी नहीं था। अतः शीला ने सकुचाकर एक फटी हुई चद्दर पर उसको बिठाया।

माँजी बोलीं- क्यों शीला! मुझे पहचाना नहीं? हर शुक्रवार को लक्ष्मीजी के मंदिर में भजन-कीर्तन के समय मैं भी वहाँ आती हूँ।’ इसके बावजूद शीला कुछ समझ नहीं पा रही थी। फिर माँजी बोलीं- ‘तुम बहुत दिनों से मंदिर नहीं आईं अतः मैं तुम्हें देखने चली आई।’

माँजी के अति प्रेमभरे शब्दों से शीला का हृदय पिघल गया। उसकी आँखों में आँसू आ गए और वह बिलख-बिलखकर रोने लगी। माँजी ने कहा- ‘बेटी! सुख और दुःख तो धूप और छाँव जैसे होते हैं। धैर्य रखो बेटी! मुझे तेरी सारी परेशानी बता।’ माँजी के व्यवहार से शीला को काफी संबल मिला और सुख की आस में उसने माँजी को अपनी सारी कहानी कह सुनाई।

कहानी सुनकर माँजी ने कहा- ‘कर्म की गति न्यारी होती है। हर इंसान को अपने कर्म भुगतने ही पड़ते हैं। इसलिए तू चिंता मत कर। अब तू कर्म भुगत चुकी है। अब तुम्हारे सुख के दिन अवश्य आएँगे। तू तो माँ लक्ष्मीजी की भक्त है। माँ लक्ष्मीजी तो प्रेम और करुणा की अवतार हैं। वे अपने भक्तों पर हमेशा ममता रखती हैं। इसलिए तू धैर्य रखकर माँ लक्ष्मीजी का व्रत कर। इससे सब कुछ ठीक हो जाएगा।’

शीला के पूछने पर माँजी ने उसे व्रत की सारी विधि भी बताई। माँजी ने कहा- ‘बेटी! माँ लक्ष्मीजी का व्रत बहुत सरल है। उसे ‘वरदलक्ष्मी व्रत’ या ‘वैभवलक्ष्मी व्रत’ कहा जाता है। यह व्रत करने वाले की सब मनोकामना पूर्ण होती है। वह सुख-संपत्ति और यश प्राप्त करता है।’

शीला यह सुनकर आनंदित हो गई। शीला ने संकल्प करके आँखें खोली तो सामने कोई न था। वह विस्मित हो गई कि माँजी कहाँ गईं? शीला को तत्काल यह समझते देर न लगी कि माँजी और कोई नहीं साक्षात्‌ लक्ष्मीजी ही थीं।

दूसरे दिन शुक्रवार था। सबेरे स्नान करके स्वच्छ कपड़े पहनकर शीला ने माँजी द्वारा बताई विधि से पूरे मन से व्रत किया। आखिरी में प्रसाद वितरण हुआ। यह प्रसाद पहले पति को खिलाया। प्रसाद खाते ही पति के स्वभाव में फर्क पड़ गया। उस दिन उसने शीला को मारा नहीं, सताया भी नहीं। शीला को बहुत आनंद हुआ। उनके मन में ‘वैभवलक्ष्मी व्रत’ के लिए श्रद्धा बढ़ गई।

शीला ने पूर्ण श्रद्धा-भक्ति से इक्कीस शुक्रवार तक ‘वैभवलक्ष्मी व्रत’ किया। इक्कीसवें शुक्रवार को माँजी के कहे मुताबिक उद्यापन विधि कर के सात स्त्रियों को ‘वैभवलक्ष्मी व्रत’ की सात पुस्तकें उपहार में दीं। फिर माताजी के ‘धनलक्ष्मी स्वरूप’ की छबि को वंदन करके भाव से मन ही मन प्रार्थना करने लगीं- ‘हे माँ धनलक्ष्मी! मैंने आपका ‘वैभवलक्ष्मी व्रत’ करने की मन्नत मानी थी, वह व्रत आज पूर्ण किया है। हे माँ! मेरी हर विपत्ति दूर करो। हमारा सबका कल्याण करो। जिसे संतान न हो, उसे संतान देना। सौभाग्यवती स्त्री का सौभाग्य अखंड रखना। कुँआरी लड़की को मनभावन पति देना। जो आपका यह चमत्कारी वैभवलक्ष्मी व्रत करे, उनकी सब विपत्ति दूर करना। सभी को सुखी करना। हे माँ! आपकी महिमा अपार है।’ ऐसा बोलकर लक्ष्मीजी के ‘धनलक्ष्मी स्वरूप’ की छबि को प्रणाम किया।

व्रत के प्रभाव से शीला का पति अच्छा आदमी बन गया और कड़ी मेहनत करके व्यवसाय करने लगा। उसने तुरंत शीला के गिरवी रखे गहने छुड़ा लिए। घर में धन की बाढ़ सी आ गई। घर में पहले जैसी सुख-शांति छा गई। ‘वैभवलक्ष्मी व्रत’ का प्रभाव देखकर मोहल्ले की दूसरी स्त्रियाँ भी विधिपूर्वक ‘वैभवलक्ष्मी व्रत’ करने लगीं। वैभवलक्ष्मी व्रत’ उद्यापन विधि सात, ग्यारह या इक्कीस, जितने भी शुक्रवारों की मन्नत माँगी हो, उतने शुक्रवार ‍तक यह व्रत पूरी श्रद्धा तथा भावना के साथ करना चाहिए। आखिरी शुक्रवार को इसका शास्त्रीय विधि के अनुसार उद्यापन करना चाहिए।

Apsara Vashikaran Mantra

आखिरी शुक्रवार को प्रसाद के लिए खी‍र बनानी चाहिए। जिस प्रकार हर शुक्रवार को हम पूजन करते हैं, वैसे ही करना चाहिए। पूजन के बाद माँ के सामने एक श्रीफल फोड़ें फिर कम से कम सात‍ कुँआरी कन्याओं या सौभाग्यशाली स्त्रियों को कुमकुम का तिलक लगाकर माँ वैभवलक्ष्मी व्रत कथा की पुस्तक की एक-एक प्रति उपहार में देनी चाहिए और सबको खीर का प्रसाद देना चाहिए। इसके बाद माँ लक्ष्मीजी को श्रद्धा सहित प्रणाम करना चाहिए।

फिर माताजी के ‘धनलक्ष्मी स्वरूप’ की छबि को वंदन करके भाव से मन ही मन प्रार्थना करें- ‘हे माँ धनलक्ष्मी! मैंने आपका ‘वैभवलक्ष्मी व्रत’ करने की मन्नत मानी थी, वह व्रत आज पूर्ण किया है। हे माँ! हमारी (जो मनोकामना हो वह बोले) मनोकामना पूर्ण करें। हमारी हर विपत्ति दूर करो। हमारा सबका कल्याण करो। जिसे संतान न हो, उसे संतान देना। सौभाग्यवती स्त्री का सौभाग्य अखंड रखना। कुँआरी लड़की को मनभावन पति देना। जो आपका यह चमत्कारी वैभवलक्ष्मी व्रत करे, उनकी सब विपत्ति दूर करना। सभी को सुखी करना। हे माँ! आपकी महिमा अपार है।’ आपकी जय हो! ऐसा बोलकर लक्ष्मीजी के ‘धनलक्ष्मी स्वरूप’ की छबि को प्रणाम करें।

श्री वैभव लक्ष्मी मंत्र (Shree Vaibhav Lakshmi Mantra)

या रक्ताम्बुजवासिनी विलासिनी चण्डांशु तेजस्विनी।
या रक्ता रुधिराम्बरा हरिसखी या श्री मनोल्हादिनी॥
या रत्नाकरमन्थनात्प्रगटिता विष्णोस्वया गेहिनी।
सा मां पातु मनोरमा भगवती लक्ष्मीश्च पद्मावती ॥

 

Chandi Havan Vidhi चण्डी हवन विधि

Chandi Havan Vidhi चण्डी हवन विधि

हवन कुण्ड का पंचभूत संस्कार करें। सर्वप्रथम कुश के अग्रभाग से वेदी को साफ करें। कुण्ड का लेपन करें गोबर जल आदि से। तृतीय क्रिया में वेदी के मध्य बाएं से तीन रेखाएं दक्षिण से उत्तर की ओर पृथक-पृथक खड़ी खींचें, चतुर्थ में तीनों रेखाओं से यथाक्रम अनामिका व अंगूठे से कुछ मिट्टी हवन कुण्ड से बाहर फेंकें। पंचम संस्कार में दाहिने हाथ से शुद्ध जल वेदी में छिड़कें। पंचभूत संस्कार से आगे की क्रिया में अग्नि प्रज्वलित करके अग्निदेव का पूजन करें।

इन मंत्रों से शुद्ध घी की आहुति दें

 

  • ॐ प्रजापतये स्वाहा। इदं प्रजापतये न मम।
  • ॐ इन्द्राय स्वाहा। इदं इन्द्राय न मम।
  • ॐ अग्नये स्वाहा। इदं अग्नये न मम।ॐ सोमाय स्वाहा। इदं सोमाय न मम।
  • ॐ भूः स्वाहा। इदं अग्नेय न मम।
  • ॐ भुवः स्वाहा। इदं वायवे न मम।
  • ॐ स्वः स्वाहा। इदं सूर्याय न मम।
  • ॐ ब्रह्मणे स्वाहा। इदं ब्रह्मणे न मम।
  • ॐ विष्णवे स्वाहा। इदं विष्णवे न मम।
  • ॐ श्रियै स्वाहा। इदं श्रियै न मम।ॐ षोडश मातृभ्यो स्वाहा। इदं मातृभ्यः न मम॥

नवग्रह के नाम या मंत्र से आहुति दें। गणेशजी की आहुति दें। सप्तशती या नर्वाण मंत्र से जप करें। सप्तशती में प्रत्येक मंत्र के पश्चात स्वाहा का उच्चारण करके आहुति दें।

प्रथम से अंत अध्याय के अंत में पुष्प, सुपारी, पान, कमल गट्टा, लौंग 2 नग, छोटी इलायची 2 नग, गूगल व शहद की आहुति दें तथा पांच बार घी की आहुति दें। यह सब अध्याय के अंत की सामान्य विधि है।

तीसरे अध्याय में गर्ज-गर्ज क्षणं में शहद से आहुति दें। आठवें अध्याय में मुखेन काली इस श्लोक पर रक्त चंदन की आहुति दें। पूरे ग्यारहवें अध्याय की आहुति खीर से दें। इस अध्याय से सर्वाबाधा प्रशमनम्‌ में कालीमिर्च से आहुति दें। नर्वाण मंत्र से 108 आहुति दें।