Adik Mas, Pursotam Mas, Malmas 2018 16 May to 13 June

Adik Mas, Pursotam Mas, Malmas 2018 16 May to 13 June

अधिकमास Adik Mas Pursotam Mas के अधिपति स्वामी भगवान विष्णु माने जाते हैं। पुरूषोत्तम भगवान विष्णु का ही एक नाम है। इसीलिए अधिकमास को पुरूषोत्तम मास के नाम से भी पुकारा जाता है।

 

हिंदू पंचांग के अनुसार वर्ष 2018 में दो ज्येष्ठ माह होंगे। इसकी विशेष बात यह रहेगी कि अंग्रेजी कैलेंडर के हिसाब से साल के 365 दिन में ही यह तिथियां भी शामिल होंगी। हिंदू पंचांग के हिसाब से तीन वर्षों तक तिथियों का क्षय होता है। तिथियों का क्षय होते होते तीसरे वर्ष एक माह बन जाता है। इस वजह से हर तीसरे वर्ष में अधिकमास

Pursotam Mas

होता है।हर तीसरे वर्ष पंचांगों में एक चन्द्रमास की वृद्धि कर दी जाती है। इसी को अधिक मास या मलमास कहते हैं।

अधिक मास में उज्जैन में पुराणोक्त सप्तसागरों (रुद्र, क्षीर, पुष्कर, गोवर्धन, विष्णु, रत्नाकर व पुरुषोत्तम सागर) की यात्रा, स्नान व सागरों के निर्धारित दान करने का विधान है।

यह एक खगोलशास्त्रीय तथ्य है कि सूर्य 30.44 दिन में एक राशि को पार कर लेता है और यही सूर्य का सौर महीना है। ऐसे बारह महीनों का समय जो 365.25 दिन का है, एक सौर वर्ष कहलाता है।

चंद्रमा का महीना 29.53 दिनों का होता है जिससे चंद्र वर्ष में 354.36 दिन ही होते हैं। यह अंतर 32.5 माह के बाद यह एक चंद्र माह के बराबर हो जाता है। इस समय को समायोजित करने के लिए हर तीसरे वर्ष एक अधिक मास होता है।

 

Sikh Guru Family Tree

Sikh Guru Family Tree

Guru Nanak Dev Ji – Guru from 1469 to 1539

The first of the Gurus and the founder of the Sikh religion was Guru Nanak. He was born at Talwandi (now known as Nankana Sahib in Pakistan) on October 20, 1469.

Guru Angad Dev Ji – Guru from 1539 to 1552

He was born in 1504. Guru Angad invented and introduced the Gurmukhi (written form of Punjabi) script and made it known to all Sikhs.

 Guru Amar Das Sahib Ji – Guru from 1552 to 1574

He was born in 1479. Guru Amardas took up cudgels of spirituality to fight against caste restrictions, caste prejudices and the curse of untouchability.

He strengthened the tradition of the free kitchen, Guru Ka Langar (started by Guru Nanak), and made his disciples, whether rich or poor, whether high born or low born (according to the Hindu caste system), have their meals together sitting in one place.

Guru Ram Das Sahib Ji – Guru from 1574 to 1581

He was born in 1534. Guruji founded the city of Amritsar and started the construction of the famous Golden Temple at Amritsar, the holy city of the Sikhs. He requested the Muslim Sufi, Mian Mir to lay the cornerstone of the Harmandir Sahib.

Guru Arjan Dev Ji – Guru from 1581 to 1606

He was born in 1563. He was the third son of Guru Ram Das Ji. Guru Arjan was a saint and scholar of the highest quality and repute.

He compiled the Adi Granth, the scriptures of the Sikhs, and wrote the Sukhmani Sahib. To make it a universal teaching, Guruji included in its hymns of Muslim saints as well as those of low-caste pariah saints who were never permitted to enter various temples.

Guru Har Gobind Sahib Ji – – Guru from 1606 to 1644

He was born in 1595. He was the son of Guru Arjan Dev and was known as a “soldier saint,” Guru Hargobind Ji organized a small army, explaining that extreme non-violence and pacifism would only encourage evil and so the principles of Miri-Piri were established.

Guru Har Rai Sahib Ji – Guru from 1644 to 1661

He was born in 1630, spent most of his life in devotional meditation and preaching the teachings of Guru Nanak.

Although Guru Har Rai Ji was a man of peace, he never disbanded the armed Sikh Warriors (Saint Soldiers), who earlier were maintained by his grandfather, Guru Hargobind. He always boosted the military spirit of the Sikhs, but he never himself indulged in any direct political and armed controversy with the Mughal Empire. Guruji cautiously avoided conflict with Emperor Aurangzeb and devoted his efforts to missionary work.

Guru Har Krishan Sahib Ji – Guru from 1661 to 1664

He was born in 1656. Guru Har Krishan was the youngest of the Gurus. Installed as Guru at the age of five, Guruji astonished the Brahmin Pundits with his knowledge and spiritual powers.

Guru Tegh Bahadur Sahib Ji – Guru from 1665 to 1675

He was born in 1621 in Amritsar.

He established the town of Anandpur. The Guru laid down his life for the protection of the Hindu religion, their Tilak (devotional forehead markings) and their sacred (Juneau) thread. He was a firm believer in the right of people to the freedom of worship.

Guru Gobind Singh Sahib Ji – Guru from 1675 to 1708

He was born in 1666 and became Guru after the martyrdom of his father Guru Tegh Bahadur.

He created the Khalsa (The Pure Ones) in 1699, changing the Sikhs into a saint-soldier order with special symbols and sacraments for protecting themselves. After the Guru had administered Amrit to his Five Beloved Ones, he stood up in supplication and with folded hands, begged them to baptize him in the same way as he had baptized them. He himself became their disciple (Wonderful is Guru Gobind Singh, himself the Master and himself the disciple). The Five Beloved Ones were astonished at such a proposal and represented their own unworthiness, and the greatness of the Guru, whom they deemed God’s representative upon earth. He gave the Sikhs the name Singh (lion) or Kaur (princess).

He fought many battles against the armies of Aurangzeb and his allies. After he had lost his father, his mother and four sons to Mughal tyranny, he wrote his famous letter (the zafarnama) to Aurangzeb, in which he indicted the Grand mughal with his treachery and godliness, after which the attacks against the Guru and his Sikhs were called off. Aurangzeb died soon after reading the letter. Soon, the rightful heir to the Mughal throne sought the Guru’s assistance in winning his kingdom. It was the envie and fear of the growing friendship between the new Emperor and the Guru which lead to the sneak attack of the Pathan assasins of Wasir Khan who inflicted the wound which later caused the Guru’s death.

Bhagavad Gita Slokas-Populor Slokas in Sanskrit

Bhagavad Gita Slokas-Populor Slokas in Sanskrit

Bhagavad Gita Slokas

यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्‍क्षति। शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स मे प्रियः॥12.17॥

भावार्थ :

जो न कभी हर्षित होता है, न द्वेष करता है, न शोक करता है, न कामना करता है तथा जो शुभ और अशुभ सम्पूर्ण कर्मों का त्यागी है- वह भक्तियुक्त पुरुष मुझको प्रिय है ।

Bhagavad Gita Slokas

Shakumbhari Devi Aarti

न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्‌ । कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः॥3.5॥

भावार्थ :

निःसंदेह कोई भी मनुष्य किसी भी काल में क्षणमात्र भी बिना कर्म किए नहीं रहता क्योंकि सारा मनुष्य समुदाय प्रकृति जनित गुणों द्वारा परवश हुआ कर्म करने के लिए बाध्य किया जाता है ।

Bhagavad Gita Slokas

यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः । स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥3.21॥

भावार्थ :

श्रेष्ठ पुरुष जो-जो आचरण करता है, अन्य पुरुष भी वैसा-वैसा ही आचरण करते हैं। वह जो कुछ प्रमाण कर देता है, समस्त मनुष्य-समुदाय उसी के अनुसार बरतने लग जाता है (यहाँ क्रिया में एकवचन है, परन्तु ‘लोक’ शब्द समुदायवाचक होने से भाषा में बहुवचन की क्रिया लिखी गई है।

Bhagavad Gita Slokas

कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन्‌ गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे। अनन्त देवेश जगन्निवास त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत्‌ ॥11.37॥

भावार्थ :

हे महात्मन्‌! ब्रह्मा के भी आदिकर्ता और सबसे बड़े आपके लिए वे कैसे नमस्कार न करें क्योंकि हे अनन्त! हे देवेश! हे जगन्निवास! जो सत्‌, असत्‌ और उनसे परे अक्षर अर्थात सच्चिदानन्दघन ब्रह्म है, वह आप ही हैं ।

Bhagavad Gita Slokas

Populor Slokas in Sanskrit Bhagavad Gita Slokas

कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन्‌ । इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते ॥3.6॥

भावार्थ :

जो मूढ़ बुद्धि मनुष्य समस्त इन्द्रियों को हठपूर्वक ऊपर से रोककर मन से उन इन्द्रियों के विषयों का चिन्तन करता रहता है, वह मिथ्याचारी अर्थात दम्भी कहा जाता है ।

Bhagavad Gita Slokas

Populor Slokas in Sanskrit Bhagavad Gita Slokas

Shri Ketu Kavacham with meaning

यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम्‌ । असम्मूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥10.3॥

भावार्थ :

जो मुझको अजन्मा अर्थात्‌ वास्तव में जन्मरहित, अनादि (अनादि उसको कहते हैं जो आदि रहित हो एवं सबका कारण हो) और लोकों का महान्‌ ईश्वर तत्त्व से जानता है, वह मनुष्यों में ज्ञानवान्‌ पुरुष संपूर्ण पापों से मुक्त हो जाता है ।

Bhagavad Gita Slokas

न कर्मणामनारंभान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते । न च सन्न्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति ॥3.4॥

भावार्थ :

मनुष्य न तो कर्मों का आरंभ किए बिना निष्कर्मता (जिस अवस्था को प्राप्त हुए पुरुष के कर्म अकर्म हो जाते हैं अर्थात फल उत्पन्न नहीं कर सकते, उस अवस्था का नाम ‘निष्कर्मता’ है । को यानी योगनिष्ठा को प्राप्त होता है और न कर्मों के केवल त्यागमात्र से सिद्धि यानी सांख्यनिष्ठा को ही प्राप्त होता है ।

Bhagavad Gita Slokas

Populor Slokas in Sanskrit Bhagavad Gita Slokas

एतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्त्वतः । सोऽविकम्पेन योगेन युज्यते नात्र संशयः ॥10.7॥

भावार्थ :

जो पुरुष मेरी इस परमैश्वर्यरूप विभूति को और योगशक्ति को तत्त्व से जानता है (जो कुछ दृश्यमात्र संसार है वह सब भगवान की माया है और एक वासुदेव भगवान ही सर्वत्र परिपूर्ण है, यह जानना ही तत्व से जानना है), वह निश्चल भक्तियोग से युक्त हो जाता है- इसमें कुछ भी संशय नहीं है ।

Bhagavad Gita Slokas

अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः । यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः ॥ कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम्‌ । तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम्‌ ॥3.14-15॥

भावार्थ :

सम्पूर्ण प्राणी अन्न से उत्पन्न होते हैं, अन्न की उत्पत्ति वृष्टि से होती है, वृष्टि यज्ञ से होती है और यज्ञ विहित कर्मों से उत्पन्न होने वाला है। कर्मसमुदाय को तू वेद से उत्पन्न और वेद को अविनाशी परमात्मा से उत्पन्न हुआ जान। इससे सिद्ध होता है कि सर्वव्यापी परम अक्षर परमात्मा सदा ही यज्ञ में प्रतिष्ठित है ।

Bhagavad Gita Slokas

बुद्धिर्ज्ञानमसम्मोहः क्षमा सत्यं दमः शमः । सुखं दुःखं भवोऽभावो भयं चाभयमेव च ॥ अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशः । भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः ॥10.4-5॥

भावार्थ :

निश्चय करने की शक्ति, यथार्थ ज्ञान, असम्मूढ़ता, क्षमा, सत्य, इंद्रियों का वश में करना, मन का निग्रह तथा सुख-दुःख, उत्पत्ति-प्रलय और भय-अभय तथा अहिंसा, समता, संतोष तप (स्वधर्म के आचरण से इंद्रियादि को तपाकर शुद्ध करने का नाम तप है), दान, कीर्ति और अपकीर्ति- ऐसे ये प्राणियों के नाना प्रकार के भाव मुझसे ही होते हैं ।

Bhagavad Gita Slokas

अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते । भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः ॥8.3॥

भावार्थ :

श्री भगवान ने कहा- परम अक्षर ‘ब्रह्म’ है, अपना स्वरूप अर्थात जीवात्मा ‘अध्यात्म’ नाम से कहा जाता है तथा भूतों के भाव को उत्पन्न करने वाला जो त्याग है, वह ‘कर्म’ नाम से कहा गया है ।

Bhagavad Gita Slokas

यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते । सर्वसङ्‍कल्पसन्न्यासी योगारूढ़स्तदोच्यते ॥6.4॥

भावार्थ :

जिस काल में न तो इन्द्रियों के भोगों में और न कर्मों में ही आसक्त होता है, उस काल में सर्वसंकल्पों का त्यागी पुरुष योगारूढ़ कहा जाता है ।

Bhagavad Gita Slokas

तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसञ्ज्ञितम्। स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा ॥6.23॥

भावार्थ :

जो दुःखरूप संसार के संयोग से रहित है तथा जिसका नाम योग है, उसको जानना चाहिए। वह योग न उकताए हुए अर्थात धैर्य और उत्साहयुक्त चित्त से निश्चयपूर्वक करना कर्तव्य है ।

Bhagavad Gita Slokas

यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः । आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते ॥3.17॥

भावार्थ :

परन्तु जो मनुष्य आत्मा में ही रमण करने वाला और आत्मा में ही तृप्त तथा आत्मा में ही सन्तुष्ट हो, उसके लिए कोई कर्तव्य नहीं है ।

Bhagavad Gita Slokas

प्रकृतेर्गुणसम्मूढ़ाः सज्जन्ते गुणकर्मसु । तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन्न विचालयेत्‌ ॥3.29॥

भावार्थ :

प्रकृति के गुणों से अत्यन्त मोहित हुए मनुष्य गुणों में और कर्मों में आसक्त रहते हैं, उन पूर्णतया न समझने वाले मन्दबुद्धि अज्ञानियों को पूर्णतया जानने वाला ज्ञानी विचलित न करेै ।

Bhagavad Gita Slokas

अंतकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्‌ । यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः ॥8.5॥

भावार्थ :

जो पुरुष अंतकाल में भी मुझको ही स्मरण करता हुआ शरीर को त्याग कर जाता है, वह मेरे साक्षात स्वरूप को प्राप्त होता है- इसमें कुछ भी संशय नहीं है ।

Bhagavad Gita Slokas

Populor Slokas in Sanskrit Bhagavad Gita Slokas

नाश्चर्यमिदं विश्वं न किंचिदिति निश्चयी। निर्वासनः स्फूर्तिमात्रो न किंचिदिव शाम्यति ॥11-8॥

भावार्थ :

अनेक आश्चर्यों से युक्त यह विश्व अस्तित्वहीन है, ऐसा निश्चित रूप से जानने वाला, इच्छा रहित और शुद्ध अस्तित्व हो जाता है। वह अपार शांति को प्राप्त करता है ।

Bhagavad Gita Slokas

नाहं देहो न मे देहो बोधोऽहमिति निश्चयी। कैवल्यं इव संप्राप्तो न स्मरत्यकृतं कृतम् ॥11-6॥

भावार्थ :

न मैं यह शरीर हूँ और न यह शरीर मेरा है, मैं ज्ञानस्वरुप हूँ, ऐसा निश्चित रूप से जानने वाला जीवन मुक्ति को प्राप्त करता है। वह किये हुए (भूतकाल) और न किये हुए (भविष्य के) कर्मों का स्मरण नहीं करता है ।

Bhagavad Gita Slokas

एवमेतद्यथात्थ त्वमात्मानं परमेश्वर । द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम ॥11.3॥

भावार्थ :

हे परमेश्वर! आप अपने को जैसा कहते हैं, यह ठीक ऐसा ही है, परन्तु हे पुरुषोत्तम! आपके ज्ञान, ऐश्वर्य, शक्ति, बल, वीर्य और तेज से युक्त ऐश्वर्य-रूप को मैं प्रत्यक्ष देखना चाहता हूँ ।

Bhagavad Gita Slokas

चिन्तया जायते दुःखं नान्यथेहेति निश्चयी। तया हीनः सुखी शान्तः सर्वत्र गलितस्पृहः॥

भावार्थ :

चिंता से ही दुःख उत्पन्न होते हैं किसी अन्य कारण से नहीं, ऐसा निश्चित रूप से जानने वाला, चिंता से रहित होकर सुखी, शांत और सभी इच्छाओं से मुक्त हो जाता है ।

Bhagavad Gita Slokas

Populor Slokas in Sanskrit Bhagavad Gita Slokas

आपदः संपदः काले दैवादेवेति निश्चयी। तृप्तः स्वस्थेन्द्रियो नित्यं न वान्छति न शोचति॥

भावार्थ :

संपत्ति (सुख) और विपत्ति (दुःख) का समय प्रारब्धवश (पूर्व कृत कर्मों के अनुसार) है, ऐसा निश्चित रूप से जानने वाला संतोष और निरंतर संयमित इन्द्रियों से युक्त हो जाता है। वह न इच्छा करता है और न शोक ।

Bhagavad Gita Slokas

सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन्प्रकाश उपजायते । ज्ञानं यदा तदा विद्याद्विवृद्धं सत्त्वमित्युत ॥14.11॥

भावार्थ :

जिस समय इस देह में तथा अन्तःकरण और इन्द्रियों में चेतनता और विवेक शक्ति उत्पन्न होती है, उस समय ऐसा जानना चाहिए कि सत्त्वगुण बढ़ा है ।

Bhagavad Gita Slokas

यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत्‌ । तदोत्तमविदां लोकानमलान्प्रतिपद्यते ॥

भावार्थ :

जब यह मनुष्य सत्त्वगुण की वृद्धि में मृत्यु को प्राप्त होता है, तब तो उत्तम कर्म करने वालों के निर्मल दिव्य स्वर्गादि लोकों को प्राप्त होता है ।

Bhagavad Gita Slokas

कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम्‌ । रजसस्तु फलं दुःखमज्ञानं तमसः फलम्‌ ॥

भावार्थ :

श्रेष्ठ कर्म का तो सात्त्विक अर्थात् सुख, ज्ञान और वैराग्यादि निर्मल फल कहा है, राजस कर्म का फल दुःख एवं तामस कर्म का फल अज्ञान कहा है ।

Bhagavad Gita Slokas

मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः । सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः सा उच्यते ॥

भावार्थ :

जो मान और अपमान में सम है, मित्र और वैरी के पक्ष में भी सम है एवं सम्पूर्ण आरम्भों में कर्तापन के अभिमान से रहित है, वह पुरुष गुणातीत कहा जाता हैूँ ।

Bhagavad Gita Slokas

Populor Slokas in Sanskrit Bhagavad Gita Slokas

यत्साङ्‍ख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्यौगैरपि गम्यते । एकं साङ्‍ख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति ॥

भावार्थ :

ज्ञान योगियों द्वारा जो परमधाम प्राप्त किया जाता है, कर्मयोगियों द्वारा भी वही प्राप्त किया जाता है। इसलिए जो पुरुष ज्ञानयोग और कर्मयोग को फलरूप में एक देखता है, वही यथार्थ देखता है ।

Bhagavad Gita Slokas

Populor Slokas in Sanskrit Bhagavad Gita Slokas

न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः । न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते ॥

 भावार्थ :

परमेश्वर मनुष्यों के न तो कर्तापन की, न कर्मों की और न कर्मफल के संयोग की रचना करते हैं, किन्तु स्वभाव ही बर्त रहा है ।

Shani Mahatmya in Marathi

Shani Mahatmya in Marathi

Shani Mahatmya in Marathi

अथ शनिमाहात्म्य प्रारंभ 

श्रीगणेशाय नमः ॥ ॐ नमोजी गणनायका ॥ एकदंता वरदायका ॥ स्वरुपसुंदरा विनायका ॥ करी कृपा मजवरी ॥१॥

आता नमूं ब्रह्मकुमारी ॥ हंसारुढ वागीश्वरी ॥ वीणा शोभे दक्षिण करीं ॥ विजयमूर्ति सर्वदा ॥२॥

नमन माझें गुरुवार्या ॥ सुखमूर्ति करुणालया ॥ नमूं संतश्रोतयांच्या पायां ॥ अभेद भेदा करुनी ॥३॥

आता नमूं श्रीपांडुरंगा ॥ यावें तुवां कथेचिया प्रसंगा ॥ निरसूनि माझिया भवसंगा ॥ करी कृपा मजवरी ॥४॥

गुजराथ भाषेची कथा ॥ नवग्रहांची तत्त्वतां ॥ ही ऐकता एकचिता ॥ संकटा व्यथा न बाधती ॥५॥

आता उज्जनीनाम नगरीं ॥ राजा विक्रम राज्य करी ॥ तेथील चरित्राची परी ॥ ऐका चित्त देऊनियां ॥६॥

कोणी एके दिवशीं प्रातः काळी ॥ बैसली होती सभामंडळी ॥ तेथे महापंडित त्या काळीं ॥ लहान थोर बैसले ॥७॥

ऐसी सभा बैसली घनदाट ॥ तेथें चर्चा निघाली सुभट ॥ म्हणती नवग्रहांत कोण श्रेष्ठ ॥ सांगावे नीट निवडोनी ॥८॥

कोण्या ग्रहाची कैसी स्थिती ॥ कैसी पूजा कैसी मती ॥ कोण रूप कैसी गती । ऐसें यथार्थ सांगावे ॥९॥

ऐसें ऐकतांचि उत्तर ॥ पंडित सरसावले समोर ॥ काढोनि पुस्तकांचा संभार ॥ बोलती ते यथामतीनें ॥१०॥

प्रथम एक पंडित बोलिला ॥ रविग्रह तो असे भला । जो लागे त्याच्या उपासनेला ॥ त्यासी ग्रहपीडा न बाधे ॥११॥

रवि तो सूर्यनारायण ॥ जे नर झाले तप्तरायण ॥ त्यांची विघ्नें होती निरसन ॥ महासामर्थ्य रवीचे ॥१२॥

आधि व्याधि दरिद्र ॥ स्मरणमात्रेंचि होती दूर ॥ मग उपासना करी जो नर ॥ चिंतले अर्थ सर्व पुरती ॥१३॥

रवि तो मुख्य दैवत ॥ त्यावीण सर्वही जाणा व्यर्थ ॥ नवग्रह आज्ञा पाळीत ॥ ऐसा श्रेष्ठ ग्रह हा ॥१४॥

ऐकता रवीची वार्ता ॥ आणि इतर ग्रहांची कथा ॥ तेणे निवारे सर्व व्यथा ॥ ऐसे नवग्रहही समर्थ ॥१५॥

परी रवि असे महाबळी ॥ सर्वांमाजी अर्तुबळी ॥ प्रत्यक्ष दिसतो नेत्रकमळीं ॥ तो हा सूर्यनारायण ॥१६॥

तंव दुसरा पंडित बोलत ॥ सोमासी असे बळ अद्‍भुत ॥ तो माळी असे म्हणवीत ॥ वनस्पती पोषीतसे ॥१७॥

जयांचे आराध्य दैवत ॥ शिव सांब कैलासनाथ ॥ त्याच्या भाळी हा विलसत ॥ म्हणोनि श्रेष्ठ जाणावा ॥१८॥

चंद्र वर्षि अमृतास ॥ तृप्त करी सर्व देवांस ॥ निशिराज महारुपस ॥ षोडश कळा जयासी ॥१९॥

तो न गांजी कोणासी ॥ अति सौख्यदाता सर्वांसी ॥ सदासर्वदा निर्मळ मानसी ॥ धन्य जयाचें पूजन ॥२०॥

मग तिसरा पंडित बोलत ॥ ऐक राया सुनिश्चित ॥ मंगळ तो महासमर्थ ॥ कथा ऐक तयाची ॥२१॥

मंगळग्रह हा महाक्रूर ॥ जैसी कां ते खड्‍गाची धार । तयाचा न कळे पार ॥ सर्व ग्रहांमाजी वरिष्ठ हा ॥२२॥

मंगळग्रह हा सोनार ॥ क्रूरता जयाची अति थोर ॥ पोर तो पूजकासी कृपाकर ॥ मंगल करी सर्वदा ॥२३॥

गर्व धरुनि पूजा न करिती ॥ मग तो खवळे उग्रमूर्ती ॥ विलया जाय संतती संपत्ती ॥ शेवटी नाश करी जीवित्वाचा ॥२४॥

तोचि पूजकासी सदा प्रसन्न ॥ सर्व अर्थ करी पावन ॥ सर्व दुःख निरसुन ॥ अंतरबाह्य संरक्षी ॥२५॥

तंव बोले चौथा पंडीता ॥ बुध असे महाबळवंत ॥ बुधाचा प्रताप अद्‍भूत ॥ सर्व ग्रहांमाजी ॥२६॥

बुध जातीचा असे वाणी ॥ नवग्रहांत शिरोमणी ॥ विघ्ने नासती तयाच्या पूजनी ॥ सर्वानंद प्राप्त करी ॥२७॥

बुध ज्यावरी कृपा करी ॥ लक्ष्मीवंत त्यासी करी ॥ ऐसा तो महापरोपकारी ॥ बुधग्रह जाणिजे ॥२८॥

बुधग्रह आहे ज्यास नीट ॥ त्यास सर्व मार्ग सुचती सुभट ॥ कोणत्या कार्यासही तूट ॥ तो न करी कल्पांती ॥२९॥

बुधाची बुद्धी भारी ॥ कोणासी निष्ठुरता तो न करी ॥ संसारचिंता हरी ॥ प्राणिमात्राची ॥३०॥

मग बोले पाचवा पंडित ॥ गुरुचे सामर्थ्य असे अद्‍भूत ॥ गुरु ते श्रेष्ठ सर्वात ॥ इंद्रादिदेवां समस्तां ॥३१॥

गुरुज्ञानाचा न कळे पार ॥ भाविकांसी तो करुणाकार ॥ कर्माकर्मांचा करी चुर ॥ भवभयव्यथेसी ॥३२॥

दुःख आणि दरिद्र्य रोग ॥ स्मरणमात्रें होती भंग ॥ नवग्रहांत महायोग्य ॥ ऐसा जाणिजे ॥३३॥

गुरु जातिचा असे ब्राह्मण ॥ सर्वांत श्रेष्ठ असे वर्ण ॥ सर्व देव करिती मान्य ॥ गुरुवचनासी ॥३४॥

गुरु असे ज्ञानाचा पुरा ॥ तुयाच्या साम्यासी नसे दुसरा ॥ त्यापुढे नुरेचि थारा ॥ कल्पनेचा कदाही ॥३५॥

म्हणोने करितां गुरुसेवा ॥ मग ग्रहांचा कोण केवा ॥ गुरु सर्वभार्वे भजावा । तेणे संतोष सर्व ग्रहांसी ॥३६॥

शिव करी गुरुपुजनासी । तेथें पाड काय इतरांसी । ऐसा श्रेष्ठ जो सर्वांसी ॥ आगमागम ॥३७॥

तंव सहावा पंडित बोलिला ॥ शुक्रग्रह असे बहु भला ॥ जेणे राक्षसां उपकार केला ॥ संजीवनीमंत्रेकरोनी ॥३८॥

शुक्र गुरु तो दैत्यांचा ॥ त्रिभुवनीं धाक वाहती जयाचा ॥ पार न कळे सामर्थ्याचा ॥ म्हणोनि श्रेष्ठ तो ॥३९॥

शुक्राची शक्ती आहे फार ॥ तो करी कर्माकर्माचा चूर ॥ विघ्ने पळती दूरच्या दूर ॥ शुक्रांचे नाम घेतां ॥४०॥

शुक्रपूजनी जे तत्पर ॥ त्याच्या शौर्यासी नाही पारावार ॥ जो दिव्यदेही निरंतर ॥ एकाक्ष तो ॥४१॥

आधि व्याधि दुःख दरिद्र ॥ स्मरणमात्रेंचि होती दूर ॥ सर्वभीष्ट परिकर ॥ प्राप्त करी पूजका ॥४२॥

नवग्रहांत शिरोमणी ॥ ज्याचा महिमा वर्णिजे पुराणी ॥ मान्यता श्रेष्ठ सर्वांहुनी ॥ शुक्राची असे जाण पां ॥४३॥

ऐसे हे सहा ग्रह ऐकोनि राजा ॥ तर्जनी मस्तक डोलवी वोजा ॥ म्हणे उत्तम कथिले काजा ॥ अखंडीत यांते स्मरावे ॥४४॥

आणिक ग्रह राहिले कोण ॥ सांगा पंडीत हो निवडुन ॥ कैसी त्यांची नामें खूण ॥ त्या मूर्तीसी बोलिजे ॥४५॥

मग संकेत बोले पंडीत ॥ राहु आणि दुसरा केतु ॥ हे उभयंता अति अद्‍भूत ॥ दैत्यकूळीचें असती ॥४६॥

मातंग जातीचे दोन्ही ॥ दुष्ट क्रिया म्हणवोनी ॥ त्यांच्या दर्शनें चंद्रसूर्य गगनीं ॥ चळचळां कांपती ॥४७॥

राहु पीडी चंद्रासी । केतु तो सूर्यासी ॥ ग्रहण बोलिजे तयासी ॥ प्रत्यक्ष द्दष्टीसी दिसतसे ॥४८॥

प्रणिमात्र सर्व जन ॥ त्यांसी न सांडिती पीडेवीण ॥ परी केलिया पूजन स्मरण ॥ किचिंत पीडा करितासी ॥४९॥

राहु महापीडक अनिवार माया ॥ तद्रुपचि केतु जाण राया ॥ उभयतांची एक चर्या ॥ पूजनस्मरणें संतोषती ॥५०॥

सर्व ग्रहांपरीस अति क्रूर ॥ जनांसी पीडा करती फार ॥ म्हणोनि पूजन स्मरण निरंतर ॥ राहुकेतूचे करावे ॥५१॥

तवं नववा पंडित बोलत ॥ शनिग्रह श्रेष्ठ अवघ्यांत ॥ बलाढ्य होय अद्‍भुत ॥ नकळे कळा तयाची ॥५२॥

तो ज्यावरी करी कृपा ॥ त्यासी सर्व मार्ग असे सोपा ॥ ग्रहदिक्पाळावर छापा ॥ तया शनिग्रहाचा ॥५३॥

ज्यावरी तो कोपसी चढे ॥ तयावरी नाना विघ्नें ये रोकडे ॥ तयाचा संसार बिघडे ॥ न राहे कल्पांती ॥५४॥

शनिदेव महाकोपी ॥ ज्याचा पराजय नोहे युद्धीं ॥ देवदानवां त्रिशुद्धी ॥ दुःखदाता शनिदेव ॥५५॥

जो का भाविक सज्ञान नर ॥ या ग्रंथाचा करी आदर ॥ पूजन स्मरण निरंतर ॥ त्यावर कृपा करी शनिदेव ॥५६॥

शनैश्वराची मूर्ति काळी ॥ तो जातीचा होय तेली ॥ चरण पंगु सुरत चांगली ॥ पूजा करी काळभैरवाची ॥५७॥

त्याची द्दष्टी पडे जयावर ॥ करी तयाचा चकनाचूर ॥ अथवा कृपा करी जयावर ॥ तयासी सर्व आनंदच प्राप्त होय ॥५८॥

द्दष्टीचा ऐका चमत्कार ॥ जन्मला जेव्हा शनैश्चर ॥ तेव्हा द्दष्टी पडली पित्यावर ॥ तेणें कुष्ठ भरला सर्वांगी ॥५९॥

पित्याच्या रथीं होता जो सारथी ॥ तो पांगुळ झाला निश्चिती ॥ अश्वचिता नेत्रांप्रती ॥ अंधत्व आले तत्क्षणी ॥६०॥

तेव्हा त्यांनी उपाय केले फार ॥ तरी गूण न येचि अणुमात्र ॥ जव द्दष्टी फिरवी शनैश्चर ॥ तंव निघेही आरोग्य हाले ॥६१॥

ऐसे ऐकतां राजा विक्रम ॥ हांसुनि बोले सप्रेम ॥ म्हणजे पुत्र जन्मोनि काय काम ॥ ऐसा अपवित्र जो ॥ ६२॥

तो पुत्र नव्हे केवळ वैरी ॥ जो उपजतांच ऐसें करी ॥ पुढे तो काय न करी ॥ सांगा पंडीत हो ॥ ६३॥

ऐसें बोलिला हासोन ॥ करी टाळी वाजवी गर्जोन ॥ सभेसी विनोदवचन ॥ म्हणे हा पुत्र कैसा हो ॥६४॥

ऐसें बोलतां ते अवसरी ॥ कैसी वर्तली नवलपरी ॥ ती ऐकावी आतां चतुरीं ॥ चित्त देऊनियां ॥६५॥

त्या समयी शनिदेव विमानीं ॥ जात होते बैसोनि ॥ रायाचें वाक्य ऐकतां तत्क्षणी ॥ विमान खाली उतरलें ॥६६॥

अकस्मात येऊनियां सभेत ॥ बैसले तेव्हां विमानासहित ॥ तवं पहाते झाले सभापंडित ॥ म्हणती आले शनिदेव ॥६७॥

मग राव उठे झडकरोनी ॥ जाऊनि नमन करी चरणी ॥ तंव टाकिला झिडकरोनी ॥ शनिदेवांने ॥६८॥

म्हणे तू राजा ऐसा मस्त ॥ टवाळी करीसी अद्‍भूत ॥ याचा चमत्कार क्षणांत ॥ दावीन पाहें आतांचि ॥६९॥

तूं फार करितोसी टवाळी ॥ नसतीच चढवली कळी ॥ तरी कन्याराशीस मुळी ॥ तुजला ग्रह मी आलो ॥७०॥

आतां पाहें माझा चमत्कार ॥ तूं नको करुं गर्व फार ॥ ऐसें वदोनि अति सत्वर ॥ विमानरुढ पैं झाला ॥७१॥

तंव तो राव लागे चरणासी ॥ म्हणे कृपा करावी दीनासी ॥ अन्याय घाली पोटासी ॥ कृपाळुवा शनिदेवा ॥७२॥

तरी तो न मानीच शनिदेव ॥ म्हणे मी तुज दाखवीन अनुभव ॥ तेव्हा मनी खिन्न जाहला राव ॥ चिंता मानसीं फार करी ॥७३॥

मग म्हणतसे पंडितांला ॥ आम्ही महाग्रह उगाचि छळिला । तो आतां कष्टवील आम्हांला ॥ तरी कैसे आतां करावे ॥७४॥

जें जें पुढें होणार ॥ म्हणोनि बुद्धि सुचे तदनुसार ॥ तरी जे असेल लिखिताक्षर ॥ तैसे आतां होईल ॥७५॥

राव दिलगीर जाहला मानसीं ॥ वसर्जन करी सभेसी ॥ जाता जाहला मंदीरासी ॥ कांही अंतरी सुचेना ॥७६॥

करुनिया संध्यास्नान ॥ मग करितसे भोजन ॥ तदनंतर करित झाला शयन ॥ नावेक पलंगावरी ॥७७॥

ऐसें करितां एक मास ॥ जाहला राया विक्रमास ॥ मग काय वर्तलें त्या कथेस ॥ तेंचि आता ऐकिजे ॥७८॥

राया विक्रमासी आला शनी ॥ बारावा अति क्रुर स्थानीं ॥ जेणे त्रासिले बहुत प्राणी ॥ अभाविकां पीडीतसे ॥७९॥

तेव्हा पंडीत बोलती वाचे ॥ राया पूजन करी शनिग्रहाचें ॥ साडेसात वर्ष नेमाचे ॥ सामर्थ्य आहे जाणिजे ॥८०॥

तुम्हीं विनोदें हांसला शनीसी ॥ तरी तो कष्टवील तुम्हांसी ॥ जो कां गांजितो त्रैलोक्यासी ॥ तोचि हा महाग्रह जाणिजे ॥८१॥

चित्त करोनियां एकाग्र ॥ ऐकावा पुजेचा प्रकार ॥ जेणें करोनि शनैश्र्चर ॥ कृपा करील तुम्हांवरी ॥८२॥

प्रथम करोनि औषधी स्नान ॥ मग करावे प्रतिमेचें पूजन ॥ अश्वाचा नाल घेऊन ॥ त्याची प्रतिमा करावी ॥८३॥

शास्त्र विधिपूजा निर्धार ॥ मग तैलअभिषेक कर ॥ मृत्तिकेच्या कुंभावर ॥ त्याची स्थापना करावी ॥८४॥

स्थापना झालिया जाण । पूगीफल ब्राह्माणासी देऊन ॥ तेवीस सहस्त्र जप संपूर्ण ॥ यथासांग करावा ॥८५॥

जपसंख्या जाहलियावरी । चतुर्थाश हवन करी ॥ हवन झालियाउपरी ॥ दानें करावी शनीचीं ॥८६॥

मग जपकर्त्या ब्राह्मणासी ॥ शनैश्र्वरुप मानूनि त्यासी ॥ दक्षिणा देऊनि पूजेसी ॥ प्रसन्नचि करावे ॥८७॥

मग करावें ब्राह्मणभोजन ॥ यथाशक्ति द्यावें दान ॥ ब्राह्मण तृप्त होतां पूर्ण ॥ संतोष पावे शनिदेव ॥८८॥

जेवीं रक्षी बाळकासी माता ॥ तैसें पडिताला ॥ तैसें रक्षी निजभक्त ॥ पंडित म्हणती राया समर्था ॥ गोष्ट एवढी ऐकावी ॥८९॥

राजा म्हणे पंडीताला ॥ शनि न मानीच आम्हांला ॥ तोचि मातापिता वाहिला ॥ रक्षा तोचि पै जाणा ॥९०॥

मग बोले विक्रम पंडितासी ॥ तुम्ही जावें आपुल्या गृहासी ॥ जें होणार असेल ते निश्चयेंसी ॥ घडुनि येईल न टळेचि ॥९१॥

ऐसें बोलोनियां उत्तर ॥ काय जाहला चमत्कार ॥ चित्त करोनिया स्थिर ॥ श्रवण करावें सर्वांही ॥९२॥

असे मग कोण एके दिवशी ॥ दोन प्रहरांच्या समयासी ॥ कारवानवेषें उज्जनीसी ॥ घोडे विकावया आला शनिदेव ॥९३॥

रुप पालटोनि आपुलें ॥ वारु विकावया आणलें ॥ तवं तेथं गिर्‍हाईक पातले ॥ रावही आला त्या स्थानी ॥९४॥

तेव्हा किंमत पुसतसे रावो ॥ तयासी म्हणे शनिदेवो ॥ वारु फिरवूनि पाहा हो ॥ मग कळेल मोल तयाचें ॥९५॥

तेव्हा सांरगा वारु राव आणवीत ॥ चाबुकस्वरासी वरी बैसवीत ॥ तेणें घोडा फिरविला चौगनांत ॥ अति उत्तम फिरतसे ॥९६॥

तंव दुसरा घोडा अबलख ॥ त्यांचे मोल रुपये लक्ष एका ॥ तो सोडूनि ताक्ताळीक ॥ आणिला विक्रमपासी ॥९७॥

तंव त्या सौदागरें काय केलें ॥ राया विक्रमासीच बैसविलें ॥ घोडा फिरवितां राव बोले ॥ अति उत्तम फिरतसे ॥९८॥

तंव त्या घोड्यासी कोरडा मारितां ॥ घोडा उडाला गगनपंथा ॥ पवनवेगें वारु जातां ॥ महावनांत ते समयीं ॥९९॥

अधिक कोरडा मारितां ॥ तो तो अधिक जाय पंथा ॥ थोर अवस्था हाये चित्ता । केवीं वर्तले म्हणवोनी ॥१००॥

दुरदेशी अतिउजाडी । जेथे घोर वन महाझाडी ॥ तेथें नदीच्या पैलथडी ॥ घोडा जाऊनि उतरला ॥१०१॥

तेथे राव उतरला खाली ॥ तंव नवलपरी वर्तली । वारु नाहीं नदी गुप्त झाली ॥ झाडाझुडांसहित ॥१०२॥

तेव्हा आश्चर्य वाटले विक्रमासी म्हणे ईश्वरी गति न कळे कोणासी ॥ वारु आणि वनासी काय विचार पै जाहला ॥१०३॥

तंव अस्तासी पावला वासरमणी ॥ अंधाकार प्रवर्तला रजनी ॥ पुढे मार्ग न दिसे नयनी ॥ मार्ग न दिसे नयनी ॥ मग तेथेंचि पहुडला ॥१०४॥

चार प्रहार गेलियावरी ॥ उद्यासी आला तमारी ॥ मग तो एक नगराचा मार्ग धरी ॥ राजा विक्रम आपण ॥१०५॥

तंव तेथोनि चार योजने दुर ॥ तामलिंगा नाम नगरी ॥ तेथें जाता झाला ते अवसरीं ॥ हळु हळु पोहोंचला ॥१०६॥

इकडे उज्जनीची कथा राहिली ॥ आतां पाहिजे श्रवण केली ॥ नगरजनें वाट पाहिली ॥ चार प्रहर रायाची ॥१०७॥

तेव्हा सौदागार म्हणे प्रधानासी ॥ वारु द्यावा आमुचा आम्हांसी ॥ कोणीकडे नेलें वारुसी ॥ राया विक्रमानें ॥१०८॥

तंव पाहते झाले नगराबाहेर ॥ कोसीं दो कोसी कोस चार ॥ परी कोठें न दिसे राजेश्र्वर ॥ मग चिंता प्रवर्तली ॥१०९॥

तेव्हा सौदागर म्हणे प्रधानासी ॥ सत्वर शोधोनि आणा रायासी ॥ नाहीं तरी आम्हांसी ॥ पैका द्यावा वारुचा ॥११०॥

तेव्हा प्रधानासी पडली चिंता ॥ मनी म्हणे कैसे करावे आतां ॥ रायाचा शोध न लागे तत्त्वतां ॥ सौदागरें अडविलें ॥१११॥

मग प्रधानें काय केले ॥ सौदागरासी बोलाविले ॥ म्हणे वारुचे मोल काय वाहिलें ॥ ते सांगा ॥ आम्हांसी ॥११२॥

तयानें मोल सांगतांचि झडकरी ॥ मग पैका घातला तयाचे पदरीं ॥ तेव्हा प्रधानासी पुसोनि सत्वरी ॥ जाता झाला शनिदेव ॥११३॥

सौदागर गेलियापाठी ॥ मागे काय वर्तली गोष्टी ॥ नगरजन सर्व होती कष्टी ॥ देश पट्टणॆं धुंडिली ॥११४॥

नगरी झाली ऐसी परी ॥ इकडे राजा विक्रम काय करी ॥ तया तामलिंदापुरा नगरीं ॥ ग्रामामाजी प्रवेशला ॥११५॥

तंव तेथे व्यवहारी सावकार ॥ जातीचा वैश्‍व धनाढ्या थोर ॥ तेव्हां तयाचे दुकानावर ॥ राजा नावेक स्थिरावला ॥११६॥

सावकाराचे दुकानी ॥ विक्री होतसे द्विगुणी ॥ त्याणे भला माणूस जाणोनी ॥ आदर केला तयाचा ॥११७॥

मग व्यवहारी बोल भावें ॥ तुम्ही आतां मुखमार्जन करावे ॥ जातीचें कोण आम्हां सांगावे ॥ नाम ग्राम तुमचे पैं ॥११८॥

राजा म्हणे तया वैश्यासी ॥ आम्ही क्षत्रिय असो परियेसी ॥ आमुचा मुलुख दूर देशी ॥ क्षणी एक येथे उतरलों ॥११९॥

मग सावकारें करविला पाक ॥ अति उत्तम षड्रसादिक ॥ भात पुरया सांडगे देख ॥ करविले बहुत प्रकार ॥१२०॥

मग तो वैश्य म्हणे क्षत्रिया ॥ उठा वेगीं जेवावया ॥ भोजन करोनि लवलाह्या ॥ मग जावें सुखरुप ॥१२१॥

मग राव करी संध्यास्नान ॥ सत्त्वर सारिता झाला भोजन ॥ उत्तम प्रकारचें पक्कान्न ॥ सेवूनि तृप्ति पावला ॥१२२॥

तेव्हा वैश्य क्षत्रियासी । सत्य सांगावे आम्हांसी ॥ मग विक्रमे यथार्थ कथिलें तयासी ॥ तेव्हा तो निज अंतरी समजला ॥१२३॥

आतां त्या सावकाराची कन्यका ॥ नाम तिचें अलोलिका ॥ तिचा पण हाचि देखा ॥ इच्छिला वर वरावा ॥१२४॥

परी तिसी न मिळे इच्छावर ॥ वैश्‍व शोध करी निरंतर ॥ तंव हा विक्रम राजा परिकर ॥ म्हणे यासी द्यावी कुमारीक ॥१२५॥

तेव्हां न बोले कुमारिकेसी ॥ बाई उत्तम वर आणिला तुजसी ॥ आतां तूं माळ घाली यासी ॥ न करी अनमान ॥१२६॥

हा स्वरुपें आहे सुंदर ॥ बत्तीसी लक्षणीं परिकर ॥ हा भाग्यवंत जाण वर ॥ यासी वरी कुमारीके ॥१२७॥

तेव्हां कुमारी बोले पित्यासी ॥ तुम्ही बुत वर्णितां यासी ॥ परि न भरतां मम मानसीं ॥ तंववरी न वरी त्यासी निर्धारीं ॥१२८॥

आज पाहीन याचें लक्षण ॥ कैसें चातुर्य काय ज्ञान ॥ भाषणावरुनि प्रमाण ॥ सर्व कळों येईल ॥१२९॥

ऐसें वदतां झाली सांज ॥ तंव अस्तासी गेला भानुराज ॥ पित्यासी म्हणे महाराज ॥ पांथिकासी पाठवावे ॥१३०॥

मग वैश्य म्हणे क्षत्रियासी ॥ जावें निद्रा करावयसी ॥ अति रम्य चित्रशाळेसी ॥ तेथे सर्व विदित होईल ॥१३१॥

मग तो विक्रम उठोनि चालिला ॥ जेथे होती चित्रशाळा ॥ तेथे हंस मयूर कोकीळा ॥ नाना प्रकारचे लेपिले ॥१३२॥

चित्रें रेखिली बहुकुशलता ॥ वारु आणि गजरथा ॥ चित्रकारें चित्र रेखितां ॥ आळस कांही न केला ॥१३३॥

पुढें पाहे राजा नयनी तंव अपूर्व मंचक देखिला तत्क्षणीं ॥ त्यावर पासोडा लेप दोन्ही ॥ अंथरुण घातलेसे ॥१३४॥

रत्‍नखचित सुरंग पलंग ॥ त्यावरी नाना परिचे रंग ॥ जाई जुई पुष्प सुरंग ॥ सेज केली अति निगुतीं ॥१३५॥

वरती लोंबती मोतियांचे घड ॥ चांदवा करीतसे फडफड ॥ समया जळती धडधड ॥ चतुष्कोणी चार पैं ॥१३६॥

ऐसें पाहुनि राव झाला चकित ॥ म्हणे न कळे काय आहे वृत्तांत ॥ हा कोण देश कोणती गत ॥ होईल ती कळेना ॥१३७॥

कर्माच्या गति असती गहना ॥ जें जें होणार तें कदा चुकेना ॥ तें तें भोगल्याविना सुटेना ॥ देवांदिका सर्वांसी ॥१३८॥

तरी हे शनिदेवाचे छळण ॥ तेणें ही माया रचिली जाण ॥ आतां होणार ते होय आपण ॥ जो सर्वांसी पीडीतसे ॥१३९॥

ऐसा मनी करोनी विचार ॥ मग निद्रा करी राजेश्वर ॥ तया पलंगी साचार ॥ सावधान निजे अंतरी ॥१४०॥

नाना परींचे करी विचार ॥ बुद्धिचे तरंग अपार ॥ म्हणोनि निद्रा न ये साचार ॥ परि मुख‍आच्छादन केलेंसे ॥१४१॥

रायें केली ऐसी परी ॥ मग वैश्यकन्या काय करी ॥ पंचारती घेऊनि करीं ॥ आली रंगमहालाकारणें ॥१४२॥

तिनें केला सर्व शृंगार । गळां शोभती मोतियाचे हार ॥ केशर कस्तुरी कर्पूर ॥ सुगंधद्रव्ये आणिली पैं ॥१४३॥

पायी पैंजण नेपुरें तीं झणत्कार करिती गरजें ॥ पदकांसी जडिले दिव्य हिरे ॥ त्यांचे तेज फाकतसे ॥१४४॥

ती जैसी पुतळीच केवळ ॥ बत्तीस लक्षणी वेल्हाळ ॥ मृगनयना विशाळभाळा ॥ येऊनि उभी ठाकली ॥१४५॥

राव निद्रेचें मिष करुन ॥ पलंगी पहुडलासे जाण ॥ तो न उठे ऐसें जाणोन ॥ मग कुमारी काय करी ॥१४६॥

चंदनपात्र घेऊनि हातीं ॥ अलोलिका होय शिंपती ॥ तरी जागा न होय नृपती ॥ कोणही प्रकारेंकरोनी ॥१४७॥

ऐसी एक प्रहर झाली कष्टी ॥ जागा न होय मग झाली हिंपुटी ॥ मुक्तहार ठेवूनि खुंटी ॥ निद्रा करी संचित ॥१४८॥

तंव निद्रा आली कामिनीसी ॥ मग राव उघडितां मुखासी ॥ विचार करी निजमानसी ॥ मी सत्त्वधीर म्हणवितो ॥१४९॥

परोपकरी माझे मन ॥ पापास भितों रात्रंदिन ॥ ही तंव कन्या असे जाण ॥ कैसें भाषण करावें ॥१५०॥

ऐसा विचार करी निजमानसी ॥ तवं तो निद्राभर कामिनीसी ॥ मग पाहता झाला चित्रांसी ॥ तेथे अपूर्व वर्तलें ॥१५१॥

चित्रीचा हंस निर्जीव ॥ परी तो काय करिता झाला लाघव ॥ खाली उतरोनि सावयव ॥ हाराचीं मोत्यें भक्षीतसे ॥१५२॥

राव पाहुनि झाला चकित ॥ मनी म्हणे हे आश्चर्यमाता ॥ परी ही गोष्ट अनुचिता ॥ दुःखदायक आपणासी ॥१५३॥

जरी हार घ्यावा काढूनि ॥ तरी बिरुद निरसुनी ॥ परासी दुःख न द्यावे म्हणुनी ॥ बिरुद असें माझे हें ॥१५४॥

परंतु गोष्टी ही अघटित ॥ आपणासी दुःख होईल प्राप्त ॥ ग्रहदर्शचें मान सत्य ॥ परी हार न काढावा ॥१५५॥

ऐसा निश्चय रायें केला ॥ इकडे सर्व हार हंसे गिळिला ॥ तें पाहुन राव निजला ॥ कुमारिकेशेजारी ॥१५६॥

तंव उगवला असे दिन ॥ कुमारी उठली खडबडोन ॥ म्हणे हा पित्यानें वर आणिला जाण ॥ अतिमूर्ख नपुंसक ॥१५७॥

मनी क्रोध आला भारी ॥ हार न देखे कुमारिका ॥ ती म्हणे पांथिका अविवेका ॥ हार घेवोनि महाटका ॥ निद्रा केली सुखरुप ॥१५९॥

तरी हार देई माझा झडकरी ॥ तुज पचणार नाहीं चोरी ॥ ऐसिया गोष्टीनें तुझी थोरी ॥ राहणार नाहीं तत्त्वतां ॥१६०॥

तरी हार दे माझा मजप्रती ॥ मग त्वां जावें आपुल्या पंथी ॥ याची चर्चा झालिया निश्चितीं ॥ नाश होईल शरिराचा ॥१६१॥

तंव पांथस्थ म्हणॆ कुमारिका ॥ हार नाही आम्हांसी ठाउका ॥ येथें निद्रा केली म्हणोनि देखा ॥ आळ घालिसी आम्हांवरी ॥१६२॥

तंव ती कुमारी संतप्त मनी ॥ पित्यासी सांगे तत्क्षणीं ॥ म्हणे इच्छावर आणिला मजलागुनी ॥ त्याचें लक्षण अति उत्तम ॥१६३॥

तुम्ही ठक चोर आणिक घरा ॥ तो तस्कर विद्येमाजी पुरा ॥ तेणें चोरिलें माझिया हारा ॥ तरी तो मागूनि घेईंचे ॥१६४॥

तेव्हा वैश्य म्हणे पांथकासी ॥ तुज विश्राम दिधला कासयसी ॥ तरी तूं कां हार घेऊनि बैसलासी ॥ बरा झालासा उतराई ॥१६५॥

उत्तम भोजन दिधंले देखा ॥ आणि ही अर्पिली निजकन्यका । ऐसें असतां महामूर्खा ॥ हें काय आचरलासी ॥१६६॥

बराच फेडीला उपकार ॥ देई माझे कन्येचा हार ॥ मग त्वां जावे सत्वर ॥ आलिया पंथे ॥१६७॥

तंव राव म्हणॆ सावकरासी ॥ तुमचा हार नाहीं मजपाशी ॥ हा कर्मभोग ओढवला सायासी ॥ नसतसें विघ्ने हें ॥१६८॥

तेव्हा सावकारासी क्रोध आला ॥ तेणे सेवकांसी हुकूम केला ॥ बंधन करावे या तस्कराला ॥ मार द्यावा निष्ठुरपणे ॥१६९॥

यासी मारिल्यावांचून ॥ हार हस्तगत न होय जाण ॥ हा पक्का चोर म्हणोन ॥ ऐसें लक्षण पै याचें ॥१७०॥

मग त्या सेवकीं धावून सत्वर ॥ बांधिला तो मुशाफर ॥ अतिशयें दिधला मार ॥ दया नाहीं अंतरी ॥१७१॥

ते मारिती निष्ठुर होऊनी ॥ दया नाहीं अंतःकरणीं ॥ मारा मारा ऎशा वचनीं ॥ वैश्य तेव्हां बोलत ॥१७२॥

मार मारुनि केला जर्जर ॥ म्हणती हार देई गा सत्वर ॥ महानिर्दय निष्ठुर ॥ दया न ये कोणासी ॥१७३॥

मग राव म्हणे वैश्‍वासी ॥ हार नाहीं गा आम्हापाशी ॥ कष्टवितोसी शरीरासी ॥ वृथाची जाण कासया ॥१७४॥

तै वैश्य म्हणे सेवकांला ॥ हा पक्का तस्कर नव्हे भला ॥ अद्यापि नाही कबुल आला ॥ मार खातो निःशंक ॥१७५॥

मग तो व्यवहारी काय करी ॥ जाऊनि रायाचे दरबारी ॥ राया चंद्रसेना श्रुत करी ॥ सांगे सकळ वर्तमान ॥१७६॥

तें ऐकोनि राजेश्र्वर ॥ म्हणे आणावा तो तस्कर । ऐसे वचन ऎकोनि सत्वर ॥ सेवकांची मांदी धावली ॥१७७॥

त्यांनी बंधन करोनि विक्रमासी ॥ आणिते जाहले रायापाशी ॥ मग प्रणिपात केला वेगेंसीं ॥ सन्मुख उभा राहिला ॥१७८॥

मग राव बोले पांथिकासी ॥ हार आहे कीं तुजपाशी । तो देई आता सावकारासी ॥ प्राण वांचणी आपुला ॥१७९॥

तंव विक्रम बोले वचना ॥ ऐक राया चंद्रसेना ॥ हार घेतला नाहीं जाणा ॥ असत्य न बोलें कदाही ॥१८०॥

हारांचा सांगावा विचार ॥ तरी वृथा म्हणाल तुम्ही सर्व । न घडे तोचि विचार ॥ घडला असे समर्था ॥१८१॥

आम्हासी ग्रह नाहीं सानुकूल ॥ नसती उप्तन्न होते कळ ॥ त्याची काय करुन हळहळा ॥ होणार ते होतसे ॥१८२॥

बरे चोरी न करवी परंतु केली ॥ परी आता पाहिजे क्षमा केली ॥ सर्व अपराध पोटीं घालीं ॥ कृपा करीं महाराजा ॥ १८३॥

ऐसें वचन ऐकता राजेश्वर क्रोधे संतप्त जैसा खंदिरांगार ॥ गर्जना करोनि सत्त्वर ॥ काय बोलता जाहला ॥१८४॥

सेवकासी म्हणे उठा सत्वर ॥ तोडी याचे चरण कर ॥ टाकून द्या नगराबाहेर ॥ अन्न उदक न द्यावें ॥१८५॥

ऐसा रायाचा अविवेक ॥ मूढमती ते सकळीक ॥ नाहीं कोणी भाविक ॥ यथा राजा तथा प्रजा ॥१८६॥

तरी रायाचे मुखी शनैश्चर ॥ सुचुं न दे कांही विचार ॥ तोचि पीडा करी वारंवार ॥ दुःख देत रायातें ॥१८७॥

ऐसें चंद्रसेनाचे उत्तर ऐकोनि ॥ सेवक उठले झडकरोनी ॥ राया विक्रमासी चालिले घेऊनी ॥ तया नगराबाहेर ॥१८८॥

नेऊनियां नगरप्रदेशीं । तोडिते झाले करचरणांसी ॥ अश्रु येती जनांच्या नयनांसी ॥ महासंकट ओढविले ॥१८९॥

तेव्हां हात पाय चारी ॥ तोडिले त्याचे निष्ठुरीं ॥ टाकोनि ग्रामाबाहेरी ॥ सेवक गेले सांगावया ॥१९०॥

मग राजा पुसे सेवकाला । तो मेला किंवा वांचला ॥ त्याचा प्राण कोटे उरला ॥ ऐसें बोल उत्तर ॥१९१॥

मग सेवक म्हणती महाराज ॥ सत्वरचि प्राण जाईल सहज । करचरणांवीण आत्मराज ॥ कैसें सुख पावेल ॥१९२॥

खाण्यावीण हैराण ॥ शरीरीं पीडा अतिदारुण ॥ तळमळ करी रात्रंदिन ॥ महादुःख होतसे ॥१९३॥

इकडे राजा विक्रम काय करी ॥ हातापायांचे दुःख भारी । जैसा मत्स्य तळमळ करी ॥ उदकावीण जाण पां ॥१९४॥

कोणी येताती वाटसरु ॥ त्यासी पाहतां येत गहिंवरु ॥ ते म्हणती हे परमेश्वरु ॥ कोण कष्ट या प्राणियासी ॥१९५॥

जरी अन्न उदक कोणी द्यावें ॥ तरी रायें त्यासी दंडावे ॥ ताडन बंधन करावे ॥ ऐसा धाक जनांसी ॥१९६॥

ऐसें असता जाहला एक मास ॥ अति दुःख होतसे विक्रमास ॥ परी द्‍या न ये कोणास ॥ ग्रहदशा म्हणवोनी ॥१९७॥

राव विक्रम शोक करी ॥ म्हणे ग्रहा समर्था कृपा करीं ॥ निष्ठुर न व्हावें निजांतरी ॥ दया करी दीनास ॥१९८॥

ऐसी करुणा भाकितां तये वेळीं ॥ मग शनैश्चरासी कृपा आली ॥ म्हणॆ याच्या सत्वाची न कळे खोली ॥ सीमा झाली तत्त्वतां ॥१९९॥

तरी आता पीडूं नये तत्त्वतां ॥ केली रायाच्या मनीं प्रेरकता ॥ चंद्रसेन द्रवला चित्ता ॥ म्हणॆ अन्न‍उदक देत जावें ॥२००॥

अन्नउदकाची आज्ञा जाहली ॥ नगरजनांसी दया आली ॥ ते आणोनि देती नित्यकाळीं ॥ कनवाळू कृपाळू जन ॥२०१॥

अन्न‍उदकाचा होतसे सुकाळ ॥ परंतु करचरणांवीण पांगुळ ॥ त्या अति दुःखे होतसे विकळ ॥ चैन न पडे क्षणभरी ॥२०२॥

ऐशीं क्रमिलीं वर्षे दोन ॥ तोंवरी दुःख सोशिलें अति दारुण ॥ ऐसें कर्माचे विंदान ॥ भोगिल्यावीण सुटेना ॥२०३॥

तंव कोण एके दिवशीं ॥ तेलीण बैसोनि शिबिकेसी ॥ जात होती सासर्‍याची तया मार्गानें ॥२०४॥

त्या तेलिणीचें माहेर ॥ होते पै उज्जनीनगर ॥ सासरें तामलिदापुर नगर ॥ ऐसें श्रोती जाणावें ॥२०५॥

तेथील तेलियाने उज्जीनहूनी ॥ स्नुषा आणिली मूळ करोनी ॥ तंव ती त्या मार्गावरोनी ॥ येत होती उभयतां ॥२०६॥

तेव्हा त्या तेलिणीनें ॥ पाहिलें विक्रमाकारणें ॥ मनी म्हणॆ राजा केणें ॥ आणिलासे या स्थानीं ॥२०७॥

मग ती खाली उतरोनी कामिनी ॥ लागली विक्रमाच्या चरणी ॥ म्हणे हातांपायावांचोनी ॥ कोण अवस्था शरीराची ॥२०८॥

राजा अवलोकी तेलिणीकडे ॥ बाई विजयी असोत तुझे चुडे ॥ काय वृत्तांत ग्रामाकडे ॥ तो सर्व सांग मज ॥२०९॥

मग कामिनी म्हणॆ अहो राया ॥ सर्व सुखी आहेत करुणालय ॥ परी हे अवस्था तुमच्या देहा ॥ काय म्हणोनी जाहली ॥२१०॥

राव म्हणॆ ऐक पतिव्रते ॥ हा कर्मभोग जाण निरुतें ॥ ग्रहदशा फिरली मातें ॥ हें कर्तृत्व देवाचें ॥२११॥

मग सर्व सांगितलें तियेसी ॥ जें जें वर्तले ज्या समयासी ॥ ते ऐकोनि म्हणे विक्रमासी ॥ धन्य रे विधातिया ॥२१२॥

मग ती तेलीण काय करीत ॥ रायासी शिबिकेमाजी बसवीत ॥ आपुल्या गृहासी घेऊनि जात ॥ अत्यादरें करोनिया ॥२१३॥

तंव तो तेली कांपे थरथरा । म्हणे हे विघ्न आणिलें घरा ॥ जरी श्रुत होईल राजेश्र्वरा । मग कैसें करावें आपण ॥२१४॥

तेव्हा सून म्हणे श्र्वशुरासी ॥ हा विक्रमादित्य निश्‍चयसी ॥ धर्मनीती राज्य करी उज्जनीसी ॥ परी हे दशा ग्रहाची ॥२१५॥

हा मावळा देशीचा धनी ॥ जैसा उकिरड्‍यांत पडला चिंतामणी ॥ दैवें लाधला आपणालगूनी ॥ म्हणोनि आला गृहातें ॥२१६॥

मग तो तेली काय करी ॥ राया चंद्रसेना श्रुत करी ॥ आपण तस्कर टाकिला जो बाहेरी ॥ हस्तपाद खंडोनी ॥२१७॥

जरी आज्ञा होईल राजेश्वरा ॥ तरी आणीन तया तस्कारा ॥ दया उपजली मम अंतरा ॥ दीन अनाथ म्हणवोनी ॥२१८॥

मग राव म्हणे भला रे भला ॥ आणावें तया तस्कराला ॥ प्रतिपाळ करी वहिला ॥ अन्नवस्त्र देउनी ॥२१९॥

ऐसा हुकुम केला रायानें ॥ मग तेली आला घराकारणें ॥ तेव्हा तेलीयासी विक्रम म्हणॆ ॥ गोष्ट सांगतो ऐका ते ॥२२०॥

मग राव म्हणे मेहतरासी ॥ तुम्ही श्रुत न करावें कोणासी ॥ विक्रम आहे मम गृहासी ॥ ऐसें कोठें न वदावें ॥२२१॥

मग तो तेली म्हणे राजेश्वरा ॥ घाणा हांकावा माझिया घरा ॥ देईन मी अन्न आणि वस्त्रा । ऐसा नेम पैं माझा ॥२२२॥

मग विक्रम म्हणे तेलियासी ॥ धन्य तुझी बुद्धि ऐसी ॥ तुझ्या उपकार न फिटे आम्हांसी ॥ महासंकटी रक्षिलें ॥२२३॥

ऐसे करितां काहीएक दिवस ॥ होती झाले विक्रमास ॥ तया तेलियाचे घरी रात्रंदिवस ॥ घाणा हाकीतसे ॥२२४॥

तंव सात वर्ष परिपूर्ण झाली ॥ पुढे कथा कैसी वर्तली ॥ ते पाहिजे श्रवण केली ॥ एकाग्रचित्ते करोनियां ॥२२५॥

मग कोणे एके दिवशी ॥ सांयकाळ झाली निशी ॥ घाण्यावर असतां विक्रमासी ॥ बुद्धि कैसी आठवली ॥२२६॥

तो दीपरागाचा अवसर ॥ ध्यानांत आणी राजेश्वर ॥ राग आळवितो मधुर ॥ सुस्वर कंठेकरोनी ॥२२७॥

राग‍उद्धार करिता प्रत्यक्ष ॥ दीप लागले लक्षानुलक्ष ॥ जैसी दीपवाळीच देख ॥ प्रकाशमान नगरांत ॥२२८॥

तंव एकस्तंभाच्या मांडीत ॥ राजकन्या अतिरुपवंत ॥ नामें पद्मसेना निश्चित ॥ बैसलीसे आनंदे ॥२२९॥

तेव्हा तिने अवलोकिला प्रकाश ॥ मग पाचारिलें पारिचारिकेस ॥ म्हणे कोणी केलें दीपोत्सवास ॥ शोध करोनी मज सांगा ॥२३०॥

दीपवाळी तों आज नाहीं ॥ आणि लग्न ही नसे कोठेंही ॥ तरी हे आश्चर्य दिसतें काहीं ॥ पाहुनि यावें सत्वर ॥२३१॥

इकडे दीपराग झाला संपूर्ण ॥ तेव्हा मावळले मुळींहुन ॥ मग दुसरा श्रीरागनामेंकारुन ॥ तेथे राग आळवीतसे ॥२३२॥

पद्मसेना पुसे परिचारिकेसी ॥ हा पुरुष रागज्ञानी विशेषीं ॥ राग आळवितो अति सुरसीं ॥ कोण्या स्थळीं पहा गे ॥२३३॥

याचा आणावा समाचार ॥ धुंडाळावे सकळ नगर ॥ जेथे असेल तो नर । एथे आणा वेगेंसी ॥२३४॥

तेव्हा परिचारिका चौघीजणी ॥ नगरीं शोध करिती तत्क्षणीं ॥ तवं तो तेलियाच्या घरीं घाणी ॥ हांकीतसे चौरंग ॥२३५॥

त्या परतोनि राजकन्येसी सांगती ॥ कीं चौरंग केला जो निश्चितीं ॥ तो तस्कर तेलियाच्या गृहाप्रती ॥ घाणा हांकीत बैसला ॥२३६॥

तोचि करित आहे रागरंग ॥ परी स्वरुप दिसताहे बेढंग ॥ जैसे का शिमग्याचें सोंग ॥ ऐसियापरी दिसताहे ॥२३७॥

मग पद्मसेना म्हणे साचार ॥ तरी घेऊनि या तो तस्कर ॥ जीवें भावें करीन भ्रतार ॥ वेध लागला अंतरी ॥२३८॥

परिचारिका म्हणती प्रणाम ॥ परी राया श्रुत करावें जाण ॥ म्हणजे न लागे दूषण ॥ शब्द न ये आम्हावरीं ॥२३९॥

तेव्हा पद्मसेना म्हणे तुम्हांस कायी ॥ तयासी येथे आणावें पाहीं ॥ मग रायसी श्रुत करीन लवलाहीं ॥ तुम्ही मनी भिऊं नका ॥२४०॥

तेव्हा पारिचारिका निघाल्या तेथुनी । येत्या झाल्या तेल्याचि दुकानीं ॥ मग त्या तेलियासी पुसोनी ॥ तयासी घेऊनि चालिल्या ॥२४१॥

एकस्तंभाच्या मांडीवरी ॥ तयासी नेलें पै सत्वरीं ॥ मग त्यांतें अवलोकून राजकुमारी ॥ परम अंतरी संतोषली ॥२४२॥

मग ते वेद चौरंगासी ॥ तुम्ही रागज्ञानी अतिविशेषीं ॥ तरी आतां रागोद्धार करावा वेगेंसी ॥ जेणें तृप्त होती श्रवण हे ॥२४३॥

मग तो करी रागोद्धार ॥ यथान्याय गातसे सुस्वर ॥ कंठा त्याचा अति मधुर ॥ जैसा गंधर्व दुसरा ॥२४४॥

ऐसा राजकन्येच्या माडीवर ॥ रागरंग होतसे अपार ॥ तंव चंद्रसेन आपुल्या माडीवर ॥ ऐकता जाहला ॥२४५॥

मग राव पुसे परिचारिकेसी ॥ आजि कुमारिकेच्या महालसी ॥ रंगी होतो दिवसनिशी ॥ कोण कार्यासी सांग पां ॥२४६॥

मग दासी म्हणती समर्था ॥ हा अन्याय आम्हासी लावितां ॥ परी निजकन्येची अवस्था ॥ आम्हांकडे काय शब्द ॥२४७॥

परंतु आमची एक विनवणी ॥ येऊनि पाहावे निजनयनीं ॥ मग येईल कळोनी ॥ अवस्था तेथील ॥२४८॥

पद्मसेनेचा विचार ॥ आम्हा सांगता न ये साचार ॥ म्हणोनि तेथें चलावे सत्वर ॥ मग जे करणें तें करा ॥२४९॥

तंव त्या रायासी निद्रा आली ॥ पुढें कथा कैसी वर्तली ॥ ती पाहिजे श्रवण केली ॥ एकाग्रचित्ते करोनिया ॥२५०॥

राजा विक्रम त्या माडीवर ॥ बैसलासे चिंतातुर ॥ तंव साडेसात वर्षे साचार ॥ भरलीं शनिदेवाची ॥२५१॥

राजा मनीं चिंता करीत ॥ म्हणे केव्हा उज्जनीं होईल प्रात्प ॥ क्लेश भोगिलें अत्यंत ॥ परी कृपा न करी ग्रहस्वामी ॥२५२॥

ऐसा राव चिंता करीत ॥ तंव तेथे काय वर्तली मात ॥ शनिदेव होऊनि कृपावंत ॥ सन्मुख उभा ठाकला ॥२५३॥

म्हणे ऐक राया विक्रमसेना ॥ मज न ओळखसी अज्ञाना ॥ अद्यापि अनुभव तव मना ॥ आला किंवा नाहीं ॥२५४॥

मग राव उठूं पाहे झडकरोन ॥ परी ते नाहीत करचरण ॥ तेव्हा तैसाचि भूमिशयन ॥ लोटांगण घालितसे ॥२५५॥

तेव्हा शनि म्हणे राया विक्रमा ॥ धन्य धन्य तुझा महिमा ॥ आतां मी प्रसन्न राजोत्तमा ॥ इच्छा असेल तें माग ॥२५६॥

तव विक्रम सद्‍गद् बोले वचन ॥ म्हणे मनुष्यदेहा न पीडा जाण ॥ हेंचि द्यावें मज दान ॥ कृपाळुवा शनिदेवा ॥२५७॥

म्यां दुःख सोशिलें अनिवार ॥ ऐसें प्राण्यासी नाही सोसणार ॥ तर तू कोणासी न पीडी साचार ॥ हेंचि मागणे शनिदेवा ॥२५८॥

ऐसे ऐकुनि शनिदेव ॥ म्हणे धन्य धन्य तू विक्रम राव ॥ परपीडेचा अनुभव ॥ जाणतोसी निजांतरी ॥२५९॥

तूं न मागसी हात पाय ॥ राजछत्रादि सुखोपाय ॥ तरी तुज ईश्वरी म्हणों ये ॥ परदुःख निवारिसी ॥२६०॥

मग कृपा उपजली शनिदेवासी ॥ रावीं करचरणादि रुपासी ॥ पहिल्याहूनि अति विशेषीं ॥ सुंदर काया पै केली ॥२६१॥

मग राव शनिदेवाचे चरण धरी ॥ म्हणे कृपाळुवा कृपा करि ॥ हेचिं मागणें साचारीं ॥ न करी पीडा कोणासी ॥२६२॥

मग रायातें शनिदेव बोले ॥ म्यां काय तुज दुःख दिधलें ॥ दुःख गुरुनाथें पाहिले ॥ ते कष्ट कोणे रीती ॥२६३॥

तुज दुःख दाविले किंचिंत ॥ म्यां कैसे त्रासिले देवदैत्य ॥ तें श्रवण करी निश्चित ॥ गुरुपीडा अवधारीं ॥२६४॥

एके दिवशी प्रातःकाळी ॥ नमन केले गुरुमाऊली ॥ मग हस्त जोडोनि ते वेळीं ॥ विनंती करी तयासी ॥२६५॥

अहो जी श्रीगुरुनाथा ॥ मी तुमच्या राशीस येतों आतां ॥ तरी मान्य करी कृपावंत ॥ साडेसात वर्षातें ॥२६६॥

मग गुरु म्हणे गा मजसी ॥ तुम्ही कृपा करावी आम्हासी ॥ न यावे आमुच्या राशी ॥ घडी एक जाण पां ॥२६७॥

मग मी वदलों ते वेळा ॥ तुम्ही करतां माझा कंटाळा ॥ तरी मज थारा नाहीं दयाळ ॥ कोणी न करी मान्य मज ॥२६८॥

तरी पांच वर्षे मान्य करी ॥ अथवा अडीच वर्षे पदरी भरीं ॥ अडीच वर्षांची परी ॥ थोडकीच असे ॥२६९॥

परी ते मानीच गुरु ॥ मग मी म्हणे न घडे निर्धारु ॥ पुन्हां मनी केला विचारु ॥ कीं गुरुसी न गांजावे ॥२७०॥

गुरु केवळ माऊली । सदा कृपेची करी साउली ॥ गुरुवचन न मानितां ये वेळी ॥ अधःपात प्राप्त होय ॥२७१॥

ते वेळा मी लागलो चरणीं ॥ विनंती करीत विनीत वचनीं ॥ मी प्रसान्न तुज ग्रह शनि ॥ माग माग गुरुनाथा ॥२७२॥

तेव्हा गुरु म्हणे शनैश्चरा ॥ आम्हांवरी कृपा करा ॥ न यावें आमच्या शरीरा ॥ हेचि आतां मागतसे ॥२७३॥

मग मी प्रसन्न जाहलों ते क्षणी ॥ साडेसात प्रहर येतों म्हणोनि ॥ तुम्ही मान्य न केल्या सर्व प्राणी ॥ न मानिती मजलागीं ॥२७४॥

गुरुदेव म्हणॆ प्रणाम ॥ तरी सवा प्रहार येणें जाण ॥ ते म्यां मान्य केलें वचन ॥ मग आज्ञा दिघली गुरुनें ॥२७५॥

गुरु विचार करी निजमानसी ॥ स्नानसंध्यादि स्वकर्मासी । करितां दवडीन सवा प्रहरासी ॥ मग तो शनि काय करील ॥२७६॥

ऐसा गर्व धरिला मनांत ॥ तो मज कळला वृत्तांत ॥ मग म्यां विचारले चित्तांत ॥ काहीं चमत्कार दाखवूं ॥२७७॥

तवं ती आली ग्रहाची वेळ ॥ तेव्हां गुरु जाहला उतावेळ ॥ म्हणे मृत्युलोकी गंगाजळ ॥ तरी स्नानालागी पैं जावें ॥२७८॥

शनिग्रहाची पडतां छाया ॥ तेव्हा पालटली गुरुची काया ॥ मग फकीरवेर्षे तया ठाया ॥ शनैश्चर पातला ॥२७९॥

तयापासीं खरबुजें होती दोनी ॥ ती केलीं गुरुसी अर्पण ॥ मग गुरु हर्षयुक्त होऊन ॥ दोन पैसे देत तया ॥२८०॥

मग स्नान करोनि ते वेळीं ॥ धोत्रांत फळें बांधिली ॥ झारी शोभे करकमळीं ॥ चालिले ते मार्गानें ॥२८१॥

तंव पुढे दिसे एक नगरी ॥ तेथें काय जाहली परी ॥ राव प्रधान समसरी ॥ दोन पुत्र दोघांसी ॥२८२॥

ते उभयंता त्या दिवशीं ॥ गेले होते शिकरीसी ॥ दोन प्रहर झाले तयांसी ॥ वाट पाहे राजेंद्र ॥२८३॥

तंव ते येतां दिसेना ॥ इकडे उशीर जहाला भोजना ॥ तेव्हां सेवकांस केली आज्ञा ॥ धुंडुनि आणा दोघांसी ॥२८४॥

मग ते सेवक निघाले सत्वर ॥ लगबगां आले गांवाबाहेर ॥ तंव तो पुढे देखिला विप्र ॥ हातीं झोळी खरबुजांची ॥२८५॥

तंव शनैश्चरें केली माव ॥ फळांची मस्तके जाहली सावयव ॥ सेवकीं ओळखिला ब्रह्मादेव ॥ म्हणती तुम्हांपासी काय आहे ॥२८६॥

ब्राह्माण म्हणे सेवकांसी ॥ खरबुजे घेतली फराळासी ॥ सेवक म्हणती रुधिरासी ॥ स्त्राव होतो दिसताहे ॥२८७॥

तू ब्राह्माण किंवा शूद्र ॥ वास्त्रांतून गळे रुधिर ॥ काय आहे तें सत्वर ॥ दाविजे पै आम्हासीं ॥२८८॥

मग गुरु झाला भयभीत ॥ म्हणे हे अघटित काय वदत ॥ अधोद्दष्टिं झोळी पाहत ॥ तंव ते रुधिर प्रत्यक्ष ॥२८९॥

सेवक झोळी घेती हिरोन ॥ मग ते पाहती सोडोन ॥ तवं शिरकमळे निघालीं दोन ॥ प्रधानराजपुत्रांची ॥२९०॥

सेवक म्हणती रे चांडाळा ॥ महादुष्टा पतिता खळा ॥ ब्रह्मवंशी अमंगळा ॥ दया नाहीं तुज अंतरी ॥२९१॥

मग ते क्रोधयुक्त मानसीं ॥ बंधन करिती ब्राह्मणासी ॥ मारीत मारीत तयासी ॥ रायापाशीं आणिला ॥२९२॥

रायासन्मुख उभा करुन ॥ सेवके सांगती वर्तमान ॥ हा बाळहत्यारा ब्राह्मण ॥ यानें मारिलें ॥२९३॥

ऐकतांचि रायासी आली मूर्च्छना ॥ मनीं कैसें केले नारायणा ॥ एक पुत्र होता तोही मना॥ नाहीं आला तुझ्या कीं ॥२९४॥

ब्राह्मण नोहे हा काळ ॥ योनें गिळिला माझा बाळ ॥ तरी यासी नेऊन तक्ताळ ॥ सुळावरी देईजे ॥२९५॥

ऐसा हुकूम होता रायाचा सूळ करविला लोखंडाचा ॥ नेऊनि रोविला पैं साचा ॥ नगराबाहेरी ॥२९६॥

तंव भृगूचिया मंदिरात ॥ वर्तमान झालें श्रुत ॥ तेव्हां एकचि वर्तला आकांत ॥ तो लिहितां ग्रंथ विस्तारेल ॥२९७॥

परी राजपुत्राची कामिनी ॥ परिव्रता लावण्यखाणी ॥ वार्ता ऐकतां तत्क्षणीं ॥ सती जावया सिद्ध जाहली ॥२९८॥

आतां इकडे गुरुनाथासी ॥ घेऊनि गेले सुळापाशीं ॥ तेव्हां न सुचे कांही गुरुसी ॥ ग्रहदशेनें वेष्टिलें ॥२९९॥

मग गुरु वदे सेवकांला ॥ आता सुळीं न द्यावें आम्हाला ॥ दहा सहस्त्र रुपये तुम्हाला ॥ देतों क्षणभरी थांबावे ॥३००॥

दोन घटिका आम्हासी ॥ सुळी न द्यावे निश्चयेंसी ॥ मग अवलोकावें नेत्रेंसी ॥ कैसें होईल तें ॥३०१॥

ऐसें करुणशब्द बोलतां तयां ॥ मग त्या सेवकांसी आली दया ॥ तेव्हा ते म्हणती दोन घटिका थांबोनिया ॥ मग देऊं सुळावरी ॥३०२॥

ऐसें बोलतां जाणा ॥ सवा प्रहर झाला परिपूर्ण ॥ प्रधानराजपुत्र दोघेजण ॥ वारुंसहित पातले ॥३०३॥

जेणें रायाशी जाणविलें ॥ त्यांचे दरिद्र दूर केलें ॥ मग सेवकांसी आज्ञापिलें ॥ सुळी न द्यावे ब्राहण ॥ ३०४॥

तेव्हां सेवक धांवले सत्वर ॥ येऊनि नगराबाहेर ॥ सांगितला समाचर ॥ सूळीं न द्यावें ब्राह्मणा ॥ ३०५ ॥

मग तो आणिला रायापाशीं ॥ ऊभा राहिला सन्मुखेंसी ॥ आशीर्वाद देऊनियां रायासी ॥ आपुला वृत्तांत निवेदिला ॥ ३०६ ॥

ऐकोनि राव झाला सद्‍गदित ॥ म्हणे मज नव्हते विदित ॥ मी दूषण लावोनि वधीत ॥ होतों तुम्हां गुरूराया ॥ ३०७ ॥

धिक् धिक् हा संसार ॥ मी महापापी अनिवार ॥ केवढा केला अविचार ॥ राज्यमदें करोनियां ॥ ३०८ ॥

तेव्हा सद्गदित झाला नृपती ॥ गुरूचरण धरिलें प्रीतीं ॥ स्फुंदस्फुंदोनि रडे निश्चितीं ॥ मी अपराधी गुरूवया ॥ ३०९ ॥

नेणतपणें जाहला अविचार ॥ तो क्षमा करी साचार ॥ मग हात धरोनि सत्वर ॥ सिंहासनीं बैसविला ॥ ३१० ॥

मग गुरू म्हणे ऐक भूपाळा ॥ हा अन्याय नाहीं तिजला ॥ ही शनैश्चराची कळा ॥ दुःख दाविलें तयानें॥ ३११ ॥

मग झोळी आणोनि पाहती ॥ तंव तीं खरबुजेंच दिसती ॥ शिरकमळाची आकृती ॥ अदृश्य जाहली तत्काळ ॥ ३१२ ॥

असो रायें करविलें भोजन ॥ गुरूपंक्तीस बैसला आपण ॥ आणखीही दिव्य ब्राह्मण ॥ सर्वही तृप्ति पावले ॥ ३१३ ॥

मग गुरूसी वस्त्रे भूषणें ॥ दिधली राया भृगूनें ॥ तेव्हां आज्ञा घेऊनि गुरूनें ॥ प्रयाण केलें तेथोनि ॥ ३१४॥

मग शनिदेव आले गुरूपाशीं ॥ नमन केलें साष्टांगेसी ॥ म्हणे वर्तूणक जाहली कैसी ॥ ती सांगावी गुरूनाथा ॥ ३१५ ॥

गुरू म्हणे बापा शनैश्चरा ॥ सवा प्रहरांत केला माझा मातेरा ॥ साडेसात वर्षे येतासी खरा ॥ तरी मग काय होते कळेना ॥ ३१६ ॥

तूं ग्रहांमाजी ग्रह श्रेष्ठ ॥ जीवांसी देसी बहुत कष्ट ॥ मी गुरू तुज अति श्रेष्ठ ॥ बरा उपकार फेडिला ॥ ३१७ ॥

असों जें जाहलें तें बरे झालें ॥ परी ऐसें कोणा न कष्टवी वहिलें ॥ तुज शपथ माझी ये वेळे ॥ शनिग्रहा समर्था ॥ ३१८ ॥

मग शनिदेव म्हणे गुरूसी ॥ गर्व न धरावा मानसीं ॥ गर्व धरील त्या पुरुषासी ॥ ऐसेच मी गांजीन ॥ ३१९ ॥

गुरूजी तुम्हांस गर्व जाहला ॥ म्हणोनि हा अपराध घडला ॥ तरी क्षमा करा बाळकला ॥ अपराध पोटीं घालिजे ॥ ३२० ॥

मग शनि गेला शिवापाशीं ॥ म्हणें आतां येतो तुम्हांसी ॥ तंव शंभु म्हणे आम्हांसी ॥ काय करिसी येऊनियां ॥ ३२१ ॥

परी येशील तेव्हां सांगून येणें ॥ ऐसें उभयंता झाले बोलणें ॥ मग दुसरे दिवशीं शनिनें ॥ येतों म्हणोनि सुचविलें ॥ ३२२ ॥

शंकरे ऐकोनि वचनासी ॥ क्षण एक लपला कैलासी ॥ मग वदता झाला शनिसी ॥ तुवां आमुचें काय केलें ॥ ३२३ ॥

मग शनि म्हणे महादेवा ॥ तुमचा धाक त्रिभुवनीं सर्वा ॥ मजभेणें लपलती देवाधिदेवा ॥ हे काय थोडे असे ॥ ३२४॥

ऐकोनि हास्य करी कैलासराज ॥ म्हणे धन्य तुझें उग्र तेज ॥ मग कृपा करोनी सहज ॥ आज्ञा देत शनीला ॥ ३२५ ॥

मग ग्रह आला रामचंद्रासी ॥ वनवास भोगविल तयासी ॥ आणि ग्रह येता सीतेसी ॥ रावणें चोरून पैं नेलें ॥ ३२६ ॥

रावणाच्या मंचकाखालते ॥ नवग्रह होते पालथे ॥ त्यावरी मंचक ठेवूनि निरूतें ॥ रावण पहुडे नित्यकाळीं ॥ ३२७॥

मग तेथें आले नारदमुनि ॥ ते वदते झाले मजलागुनी ॥ तूं ग्रहश्रेष्ठ महाअभिमानी ॥ ऐसी दशा तुमची ॥ ३२८॥

तरी येथें तुमचे काही न चाले ॥ गरिबासी कष्टवितां बळें ॥ हें सामर्थ्य नव्हे आगळे ॥ उगाचि पुरुषार्थ भोगितां ॥ ३२९ ॥

मग शनि देव नारदासी ॥ आम्ही पालथे ते सोईचे करविसी ॥ मग पाहें पराक्रमसी ॥ कैसा आहे तो दावीन ॥ ३३० ॥

नारद म्हणे मी ऎसें करीन ॥ ऐसे बोलोनियां वचन ॥ मग रावणापाशी जाऊन ॥ सांगे तयासी विचार ॥ ३३१ ॥

म्हणे ग्रह पालथे घालून ॥ मंचकी निद्रा करिसी रात्रंदिन ॥ तरी हे अनुचित असे जाण ॥ वैरियाच्या उरावरी पाय द्यावा ॥ ३३२ ॥

ते वचन रावणा मानलें ॥ मग पालथे ते सोईचे केले ॥ तंव तेथे काय वर्तलें ॥ तें परिसावे सज्जनी ॥ ३३३ ॥

दृष्टी फिरवितां शनैश्चर ॥ षण्मासांत सहपरिवार ॥ निर्दाळी श्रीरामचंद्र ॥ पुत्रपौत्रांसहित पैं ॥ ३३४ ॥

हरिश्चंद्रासी आला शनी ॥ बारावा अतिक्रूर स्थानीं ॥ पीडिता झाला कौशिकमुनी ॥ राज्यभ्रष्ट तो केला ॥ ३३५ ॥

पुढे अति दुःख दिधले तयासी ॥ स्त्रीपुत्रादि घातले विक्रयासी ॥ सवें विकले डोंबासी ॥ तेथेंही बहुत जाचिलें ॥ ३३६ ॥

ऐसें कष्टविलें राजोत्तमा ॥ दमयंतीप्राणमनोरम ॥ दुःख दिधलें हे विक्रमोत्तमा ॥ पीडियेली दमयंती ॥ ३३७ ॥

ग्रह आला इंद्रराया ॥ भोगिली गौतमीची जाया ॥ भगांकित झाली सर्व काया ॥ ऋषी शापेंकरोनियां ॥ ३३८ ॥

ग्रह आला चंद्रासी ॥ स्पर्श केला गुरूपत्‍नीसी ॥ कलंक लागला चंद्रासी ॥ ऐसें झाले जाण पां ॥ ३३९ ॥

ग्रह आला वसिष्ठासी ॥ क्षय झाला शतपुत्रासी ॥ तैसेच पीडिलें पराशरासी ॥ मत्स्यगंधा भोगिली ॥ ३४० ॥

पांडव ग्रहदशा भोगीत ॥ राज्य हरोनि गेले वनात ॥ कौरवांचा क्षय केला क्षणांत ॥ ग्रह येताची तत्त्काळीं ॥ ३४१ ॥

तैसाचि श्रीकृष्णासी ग्रह आला ॥ स्यमंतकाचा डाग लागला ॥ तो कोणत्या कारणे निघाला ॥ हरिविजयीं ती कथा ॥ ३४२ ॥

मग कृष्ण बोले शनैश्चर ॥ तूं महासमर्थ होसी खरा ॥ सर्वत्रांसी तुझा दरारा ॥ देवदानवादिकांसी ॥ ३४३ ॥

ऐसें देवादिकांसी त्रासिले ॥ त्यात तुला कांहीसें दुःख दिधले ॥ किचिंत चमत्करासी दाविलें ॥ समजावया तुजलागीं ॥ ३४४॥

मग विक्रम उठे झडकरी ॥ साष्टांग नमस्कार करी ॥ धन्य शनैश्चरा अवधारीं ॥ पावन केलें मजलागीं ॥ ३४५ ॥

आतां मी तुज अनन्यशरण ॥ कृपा करीं अनाथालागून ॥ हेचि द्यावें वरदान ॥ न पीडी प्राणीमात्रसी ॥ ३४६ ॥

मग शनि म्हणे विक्रमासी ॥ धन्य तू परोपकारी होसी ॥ परपीडा निवारितोसी ॥ उपमा नाही तुजलागीं ॥ ३४७ ॥

तेव्हा प्रसन्न झाला शनैश्चर ॥ रायासी देता झाला निजवर ॥ हा ग्रंथ श्रवण पठण करी जो नर ॥ तयासी पीडा न करीं मी ॥ ३४८ ॥

भावें करितां श्रवण पठण ॥ आदरे ग्रंथसंरक्षण ॥ त्यासी रक्षीं मी रात्रंदिन ॥ कृपा करी सर्वथा ॥ ३४९ ॥

जो कां श्रवण पठण न करी ॥ आणि ग्रंथाची हेलना करी ॥ तया नराच्या शरीरीं ॥ पीडा फार करीन मी ॥ ३५० ॥

श्रवणपठणाचा ऐका विचार ॥ नित्य अथवा शनिवार ॥ श्रवण पठण करी जो नर ॥ उपोषण अतिसंतोषें ॥ ३५१ ॥

जरी न करावे उपोषणासी ॥ तरी श्रवण करावे अहर्निशीं ॥ तेणें संतोष मम मानसीं ॥ मग पीडा न करीत तत्त्वतां ॥ ३५२ ॥

हें वचन माझें नेमस्त ॥ विक्रमासी भाष देत ॥ त्या नरासी मी भाग्यवंत ॥ करीन जाण निर्धारें ॥ ३५३ ॥

ऐसा वर देउनि रायासी ॥ शनिदेव गेले निजस्थानासी ॥ पुढे कथा वर्तली कैसी ॥ ती श्रवण करावी श्रोतेहो ॥ ३५४ ॥

राजकन्येच्या माडीवर ॥ विक्रमासी भेटले शनैश्चर ॥ तेव्हां रायाचें दिव्य झालें शरीर ॥ जैसा सूर्य प्रगटला ॥ ३५५ ॥

तंव चंद्रसेन राव आला ॥ पाहे तंव देखे विक्रमाला ॥ जैसा मदनाचा पुतळा ॥ तटस्थ जाहला मानसीं ॥ ३५६ ॥

मग ते पद्मसेना राजकुमारी ॥ राया विक्रमाते वरी ॥ राव पुसे ते अवसरीं ॥ आपण कोण महाराज ॥ ३५७ ॥

विक्रम वदे सचार ॥ मी तुमचा असे चोर ॥ श्रीपती वैश्य सावकार ॥ बोलव आधीं तयासी ॥ ३५८॥

तंव ते धावली सेवकांची मांदी ॥ वैश्य बसा होता गादी ॥ म्हणति बोलविलें राये आधीं ॥ सत्वर तेथें चलावे ॥ ३५९॥

वैश्य उठला झडकरोन ॥ येऊनि रायासी करी नमन ॥ राव बोले वैश्यालागून ॥ हाचि तस्कर होय कीं ॥ ३६० ॥

वैश्य म्हणे रायासी ॥ आतां चला मम मंदिरासी ॥ अवश्य म्हणोनि वेगेंसी ॥ चित्रशाळेसी पातले ॥ ३६१ ॥

तंव चित्राचा निर्जीव हंस ॥ जेणें गिळिलें होते हारास ॥ तो पुन्हां उगाळी सावकाश ॥ जैसा होता तैसाचि ॥ ३६२ ॥

हार उगाळितां हंसाने ॥ तो पाहिला सर्वजनें ॥ हें आश्चर्य सकळांकारणें ॥ म्हणती हे अघटित ॥ ३६३ ॥

मग तो वैश्य वाणी बहु संतोषला निजमनीं ॥ कन्या अर्पूनि चरणीं ॥ विक्रमाच्या लागला ॥ ३६४ ॥

जन म्हणती अघटित कळा ॥ निर्जीव लेपें हार गिळिला ॥ दोष लाविला महापुरुषाला ॥ तें आजि कळों आलें ॥ ३६५ ॥

चंद्रसेन पुसे विक्रमासी ॥ आपण राहतां कोणे देशी ॥ कोण नाम कोणे वंशी ॥ जन्म तुमचा सांगावा ॥ ३६६ ॥

तंव विक्रम म्हणे चंद्रसेना ॥ काय पुससी विचक्षणा ॥ मी असे उज्जणीचा राणा ॥ नाम माझे विक्रम ॥ ३६७ ॥

ऐसे ऐकता राजेश्वर ॥ घाली साष्टांग नमस्कार ॥ म्हणे अन्याय घडेल थोर ॥ कृपा करीं दयाळा ॥ ३६८ ॥

तेव्हांच केले असते श्रुत ॥ तरी कष्ट का होते प्राप्त ॥ न कळतां झालें अनुचित ॥ त्यासी उपाय कायसा ॥ ३६९ ॥

विक्रम म्हणे राजेश्वरा ॥ हा आमुच्या ग्रहदशेचा फेर ॥ पूजन न केले शनैश्चरा ॥ म्हणोनि कष्ट पावलों ॥ ३७० ॥

तंव ग्रह नव्हता सानुकूळ ॥ म्हणोनि तंव बुद्धि विकळ ॥ आतां ग्रह झाला सानुकूळ ॥ म्हणोनि ऐसें वदतोसी ॥ ३७१ ॥

असो रायानें सोहळा केला फार ॥ फोडिलें द्रव्याचे भांडार ॥ धर्म केला अपार ॥ याचकजन संतोषती ॥ ३७२ ॥

मग तो तेली बोलाविला ॥ विक्रमें तयासी नमस्कार केला ॥ एक देश तया देवविला ॥ सुखी केला तये वेळीं ॥ ३७३ ॥

चंद्रसेन हर्षभरित ॥ म्हणे मम भाग्यासी नाही अंत ॥ विक्रम जोडा जामात ॥ धन्य मी एक संसारी ॥ ३७४ ॥

ऐसें करिता एक मास ॥ झाला राया विक्रमास ॥ मग पुसोनियां चंद्रसेनास ॥ आज्ञा मागतसे नृपती ॥ ३७५ ॥

मग चतुरंग दळ सिद्ध करून ॥ हत्ती घोडे दासदासी जाण ॥ देश पट्टणें ग्राम देऊन ॥ जामातासी बोळविले ॥ ३७६ ॥

तवं त्या सावकारें आपण ॥ नाना वस्तु अनर्घ्य रत्‍न ॥ विक्रमासी देऊन ॥ बोळवण केली कन्येची ॥ ३७७ ॥

असो सर्वे घेऊनि द्ळभार ॥ उज्जनीसी आला राजेश्वर ॥ नगर शृंगारिलें सत्वर ॥ अति आनंद होतसे ॥ ३७८ ॥

मग सुमुहूर्त पाहूनी ॥ विक्रम बैसविला सिंहासनीं ॥ याचक तृप्त केले दानीं ॥ चिंता चित्ती असेना ॥ ३७९ ॥

मग शनैश्चरव्रत ॥ राजा विक्रम आचारित ॥ पीडा गेली समस्त ॥ शनिप्रसादेंकरोनि ॥ ३८० ॥

ही महाराष्ट्रभाषेची कथा ॥ परी अर्थाविषयीं नाहीं न्यूनता ॥ यथामति वर्णिली तत्वतां ॥ श्रवण करा भाविक हो ॥ ३८१ ॥

हा ग्रंथ करितां श्रवण ॥ सकळ विघ्नें जाती निरसून ॥ ग्रहपीडा अति दारुण ॥ न बाधे कदा कल्पांती ॥ ३८२ ॥

ऐकता कथा नवग्रहांची ॥ येणें पीडा निवारे क्लेशाची ॥ वार्ताही नुरे दुःखाची ॥ कृपा करिती ग्रह सर्व ॥ ३८३ ॥

श्रवणपठणीं निदिध्यास ॥ लेखक पाठक सर्वास ॥ ग्रंथ संरक्षी तयास ॥ क्लेश विघ्नें न बाधिती कदा ॥ ३८४ ॥

ही शनैश्चराची ख्याती ॥ केवळ शनैश्चराची मूर्ती ॥ अहर्निश जे कां ध्याती ॥ त्यांसी संरक्षी शनिदेव ॥ ३८५ ॥

सकळ दुःख दरिद्र ॥ येणें निरसेल समग्र ॥ भावें श्रवण करिता साचार ॥ फळ प्राप्त तयासी ॥ ३८६ ॥

म्हणे तात्याजी महिपती ॥ ही प्रीति पावो शनैश्चरापती ॥ कृपाळू तो उग्रमूर्ती ॥ निर्विघ्न करी सर्वांची ॥ ३८७ ॥

इति श्रीशनैश्चराची कथा ॥ त्याचा तोची वदविता ॥ आपुली तो मायिक वार्ता ॥ करविता श्रीपांडुरंग ॥ ३८८ ॥

इति श्रीशनैश्चरमाहात्म्यं संपूर्णम् ॥

शुभं भवतु ॥ श्रीरस्तु ॥

वेद, पुराण एवं उपनिषद्

वेद, पुराण एवं उपनिषद्

Shakumbhari Devi Chalisa

Chardham Name and Places

Chardham Name and Places

चारधाम

चारधाम की स्थापना आद्य शंकराचार्य ने की। उद्देश्य था उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम चार दिशाओं में स्थित इन धामों की यात्रा कर मनुष्य भारत की सांस्कृतिक विरासत को जाने-समझें।

बदरीनाथ धाम

कहां है- उत्तर दिशा में हिमालय पर अलकनंदा नदी के पास
प्रतिमा- विष्णु की शालिग्राम शिला से बनी चतुर्भुज मूर्ति। इसके आसपास बाईं ओर उद्धवजी तथा दाईं ओर कुबेर की प्रतिमा।

द्वारका धाम

कहां है- पश्चिम दिशा में गुजरात के जामनगर के पास समुद्र तट पर।
प्रतिमा- भगवान श्रीकृष्ण।

रामेश्वरम

कहां है- दक्षिण दिशा में तमिलनाडु के रामनाथपुरम जिले में समुद्र के बीच रामेश्वर द्वीप।
प्रतिमा- शिवलिंग

जगन्नाथपुरी

कहां है- पूर्व दिशा में उड़ीसा राज्य के पुरी में।
प्रतिमा- विष्णु की नीलमाधव प्रतिमा जो जगन्नाथ कहलाती है। सुभद्रा और बलभद्र की प्रतिमाएं भी।

 

THE MINOR SIDDHI OR RIDDHI