Aarti Sai Baba English Lyrics

Aarti Sai Baba English Lyrics

Aarti Sai Baba English Lyrics

Arati Sai Baba. Saukhyadatara Jiva.

Caranarajatali Dyava dasa visava, bhakta visava Aarti…

Jaluniya ananga. Sasvarupi rahe danga Mumuksa janan davi.

Nija dola Sriranga. Dola Sriranga Aarti…

Jaya mani jaisa bhava.

Tayataisa anubhava Davisi dayaghana, Aisi tuzi he mava, tuzi he mava. Aarti…

Tumace nama dhyata.

Hare Sansruthivyatha Agadha Tava karani. Marga davisi anatha, davisi anatha. Aarti…

Kaliyuga Avatara, Saguna Brahma sachara Avatirna zalase Svami Datta Digambara, Datta Digambara. Aarti…

Athan Divasa Gurvari.Bhakta kariti vari.

Prabhupada Pahavaya Bhava Bhayanivari, bhayanivari. Aarti…

Maza nijadravya theva, Thava carana-raja-seva Magane heci aata, Tumhan devadideva, devadideva. Aarti…

Ichita Dina chatak Nirmala toya nijasukha Pajaven Madhava Ya Sambhala apuli bhaka, apuli bhaka. Aarti…

 

Sai Baba Prarthana

Karacharanakrtam vakkayajam karmajam va Sravananayanajam

va manasam va’ paradham Viditamaviditam va sarvametatksamasva.

Jaya Jaya karunabdhe Sri Prabho Sainatha Sri sacchidananda sadguru Sainatha maharaja ki Jai.

Aum Rajadhiraja Yogiraja Parabrahma Sainatha Maharaja Sri sacchidananda sadguru Sainatha maharaja ki Jai.

 

Sai Baba of Shirdi

also known as Shirdi Sai Baba, was an Indian spiritual master who is regarded by his devotees as a saint, a fakir, a satguru and an incarnation (avatar) of Lord Shiva and Dattatreya.

He is revered by both his Hindu and Muslim devotees during, as well as after his lifetime.

Saibaba is now revered as an incarnation of Sri Dattatreya and considered as Saguna Brahma. He is attributed to be the creator, sustainer, and destroyer of this universe by his devotees.

He is decorated with jewels and all forms of Hindu Vedic deities as he is believed by his followers to be the supreme God. 

Shani Samhita शनि संहिता

Sarvartha Siddhi Yoga Meaning

Sarvartha Siddhi Yoga Meaning

Maa Ganga Mantra, Ganga Stuti, Ganga Stortam

Maa Ganga Mantra, Ganga Stuti, Ganga Stortam

Ganga Stortam

देवि सुरेश्वरि भगवति गङ्गे त्रिभुवनतारिणि तरलतरङ्गे ।

शङ्करमौलिविहारिणि विमले मम मतिरास्तां तव पदकमले ॥१॥

भागीरथि सुखदायिनि मातस्तव जलमहिमा निगमे ख्यातः ।

नाहं जाने तव महिमानं पाहि कृपामयि मामज्ञानम् ॥२॥

हरिपदपाद्यतरङ्गिणि गङ्गे हिमविधुमुक्ताधवलतरङ्गे ।

दूरीकुरु मम दुष्कृतिभारं कुरु कृपया भवसागरपारम् ॥३॥

तव जलममलं येन निपीतं परमपदं खलु तेन गृहीतम् ।

मातर्गङ्गे त्वयि यो भक्तः किल तं द्रष्टुं न यमः शक्तः ॥४॥

पतितोद्धारिणि जाह्नवि गङ्गे खण्डितगिरिवरमण्डितभङ्गे ।

भीष्मजननि हे मुनिवरकन्ये पतितनिवारिणि त्रिभुवनधन्ये ॥५॥

कल्पलतामिव फलदां लोके प्रणमति यस्त्वां न पतति शोके ।

पारावारविहारिणि गङ्गे विमुखयुवतिकृततरलापाङ्गे ॥६॥

तव चेन्मातः स्रोतःस्नातः पुनरपि जठरे सोऽपि न जातः ।

नरकनिवारिणि जाह्नवि गङ्गे कलुषविनाशिनि महिमोत्तुङ्गे ॥७॥

पुनरसदङ्गे पुण्यतरङ्गे जय जय जाह्नवि करुणापाङ्गे ।

इन्द्रमुकुटमणिराजितचरणे सुखदे शुभदे भृत्यशरण्ये ॥८॥

रोगं शोकं तापं पापं हर मे भगवति कुमतिकलापम् ।

त्रिभुवनसारे वसुधाहारे त्वमसि गतिर्मम खलु संसारे ॥९॥

अलकानन्दे परमानन्दे कुरु करुणामयि कातरवन्द्ये ।

तव तटनिकटे यस्य निवासः खलु वैकुण्ठे तस्य निवासः ॥१०॥

वरमिह नीरे कमठो मीनः किं वा तीरे शरटः क्षीणः ।

अथवा श्वपचो मलिनो दीनस्तव न हि दूरे नृपतिकुलीनः ॥११॥

भो भुवनेश्वरि पुण्ये धन्ये देवि द्रवमयि मुनिवरकन्ये ।

गङ्गास्तवमिमममलं नित्यं पठति नरो यः स जयति सत्यम् ॥१२॥

येषां हृदये गङ्गाभक्तिस्तेषां भवति सदा सुखमुक्तिः ।

मधुराकान्तापज्झटिकाभिः परमानन्दकलितललिताभिः ॥१३॥

गङ्गास्तोत्रमिदं भवसारं वाञ्छितफलदं विमलं सारम् ।

शङ्करसेवकशङ्कररचितं पठति सुखी स्तव इति च समाप्तः ॥१४॥

Ganga Stuti

गांगं वारि मनोहारि मुरारिचरणच्युतम् ।

त्रिपुरारिशिरश्चारि पापहारि पुनातु माम् ।।

Maa Ganga Mantra

1) नमः शिवायै गंगायै शिवधायै नमो नमः |

2) नमस्ते रूद्र रूपिण्यै शंकर्यै नमो नमः ||

3) ॐ ह्रीं गंगायै |

4) ॐ ह्रीं स्वाहा ||

यं वैदिका मन्त्रदृशः पुराणाः इन्द्रं यमं मातरिश्वा नमाहुः।

वेदान्तिनो निर्वचनीयमेकम् यं ब्रह्म शब्देन विनिर्दिशन्ति॥

शैवायमीशं शिव इत्यवोचन् यं वैष्णवा विष्णुरिति स्तुवन्ति।

बुद्धस्तथार्हन् इति बौद्ध जैनाः सत् श्री अकालेति च सिख्ख सन्तः॥

शास्तेति केचित् कतिचित् कुमारः स्वामीति मातेति पितेति भक्त्या।

यं प्रार्थन्यन्ते जगदीशितारम् स एक एव प्रभुरद्वितीयः॥

Shakumbhari Devi Aarti

Shakumbhari Devi Aarti

हरि ॐ श्री शाकुम्भरी अम्बाजी की आरती कीजो
ऐसी अद्भुत रूप हृदय धर लीजो

शताक्षी दयालु की आरती कीजो
तुम परिपूर्ण आदि भवानी मां, सब घट तुम आप बखानी मां
शाकुम्भरी अम्बाजी की आरती कीजो
तुम्हीं हो शाकुम्भर, तुम ही हो सताक्षी मां
शिवमूर्ति माया प्रकाशी मां,
शाकुम्भरी अम्बाजी की आरती कीजो
नित जो नर-नारी अम्बे आरती गावे मां
इच्छा पूर्ण कीजो, शाकुम्भर दर्शन पावे मां
शाकुम्भरी अम्बाजी की आरती कीजो
जो नर आरती पढ़े पढ़ावे मां, जो नर आरती सुनावे मां
बस बैकुंठ शाकुम्भर दर्शन पावे
शाकुम्भरी अंबाजी की आरती कीजो।

श्री गौमाता जी की आरती

श्री गौमाता जी की आरती

आरती श्री गैय्या मैंय्या की, आरती हरनि विश्‍व धैय्या की॥

अर्थकाम सद्धर्म प्रदायिनि, अविचल अमल मुक्तिपददायिनि।
सुर मानव सौभाग्य विधायिनि, प्यारी पूज्य नंद छैय्या की॥
॥आरती श्री गैय्या मैंय्या की…॥

अख़िल विश्‍व प्रतिपालिनी माता, मधुर अमिय दुग्धान्न प्रदाता।
रोग शोक संकट परित्राता, भवसागर हित दृढ़ नैय्या की॥
॥आरती श्री गैय्या मैंय्या की…॥

आयु ओज आरोग्य विकाशिनि, दुख दैन्य दारिद्रय विनाशिनि।
सुष्मा सौख्य समृद्धि प्रकाशिनि, विमल विवेक बुद्धि दैय्या की॥
॥आरती श्री गैय्या मैंय्या की…॥

सेवक जो चाहे दुखदाई, सम पय सुधा पियावति माई।
शत्रु मित्र सबको दुखदायी, स्नेह स्वभाव विश्‍व जैय्या की॥
॥आरती श्री गैय्या मैंय्या की…॥

आरती श्री गैय्या मैंय्या की, आरती हरनि विश्‍व धैय्या की॥

 

Buddha Purnima 2018: Sidhi Yoga Will Bring Wealth And Prosperity

Kamakhya Chalisa कामाख्या चालीसा

Kamakhya Chalisa कामाख्या चालीसा

॥ दोहा ॥
सुमिरन कामाख्या करुँ, सकल सिद्धि की खानि ।
होइ प्रसन्न सत करहु माँ, जो मैं कहौं बखानि ॥

जै जै कामाख्या महारानी । दात्री सब सुख सिद्धि भवानी ॥
कामरुप है वास तुम्हारो । जहँ ते मन नहिं टरत है टारो ॥
ऊँचे गिरि पर करहुँ निवासा । पुरवहु सदा भगत मन आसा ।
ऋद्धि सिद्धि तुरतै मिलि जाई । जो जन ध्यान धरै मनलाई ॥
जो देवी का दर्शन चाहे । हदय बीच याही अवगाहे ॥
प्रेम सहित पंडित बुलवावे । शुभ मुहूर्त निश्चित विचारवे ॥
अपने गुरु से आज्ञा लेकर । यात्रा विधान करे निश्चय धर ।
पूजन गौरि गणेश करावे । नान्दीमुख भी श्राद्ध जिमावे ॥
शुक्र को बाँयें व पाछे कर । गुरु अरु शुक्र उचित रहने पर ॥
जब सब ग्रह होवें अनुकूला । गुरु पितु मातु आदि सब हूला ॥
नौ ब्राह्मण बुलवाय जिमावे । आशीर्वाद जब उनसे पावे ॥
सबहिं प्रकार शकुन शुभ होई । यात्रा तबहिं करे सुख होई ॥
जो चह सिद्धि करन कछु भाई । मंत्र लेइ देवी कहँ जाई ॥
आदर पूर्वक गुरु बुलावे । मन्त्र लेन हित दिन ठहरावे ॥
शुभ मुहूर्त में दीक्षा लेवे । प्रसन्न होई दक्षिणा देवै ॥
ॐ का नमः करे उच्चारण । मातृका न्यास करे सिर धारण ॥
षडङ्ग न्यास करे सो भाई । माँ कामाक्षा धर उर लाई ॥
देवी मन्त्र करे मन सुमिरन । सन्मुख मुद्रा करे प्रदर्शन ॥
जिससे होई प्रसन्न भवानी । मन चाहत वर देवे आनी ॥
जबहिं भगत दीक्षित होइ जाई । दान देय ऋत्विज कहँ जाई ॥
विप्रबंधु भोजन करवावे । विप्र नारि कन्या जिमवावे ॥
दीन अनाथ दरिद्र बुलावे । धन की कृपणता नहीं दिखावे ॥
एहि विधि समझ कृतारथ होवे । गुरु मन्त्र नित जप कर सोवे ॥
देवी चरण का बने पुजारी । एहि ते धरम न है कोई भारी ॥
सकल ऋद्धि – सिद्धि मिल जावे । जो देवी का ध्यान लगावे ॥
तू ही दुर्गा तू ही काली । माँग में सोहे मातु के लाली ॥
वाक् सरस्वती विद्या गौरी । मातु के सोहैं सिर पर मौरी ॥
क्षुधा, दुरत्यया, निद्रा तृष्णा । तन का रंग है मातु का कृष्णा ।
कामधेनु सुभगा और सुन्दरी । मातु अँगुलिया में है मुंदरी ॥
कालरात्रि वेदगर्भा धीश्वरि । कंठमाल माता ने ले धरि ॥
तृषा सती एक वीरा अक्षरा । देह तजी जानु रही नश्वरा ॥
स्वरा महा श्री चण्डी । मातु न जाना जो रहे पाखण्डी ॥
महामारी भारती आर्या । शिवजी की ओ रहीं भार्या ॥
पद्मा, कमला, लक्ष्मी, शिवा । तेज मातु तन जैसे दिवा ॥
उमा, जयी, ब्राह्मी भाषा । पुर हिं भगतन की अभिलाषा ॥
रजस्वला जब रुप दिखावे । देवता सकल पर्वतहिं जावें ॥
रुप गौरि धरि करहिं निवासा । जब लग होइ न तेज प्रकाशा ॥
एहि ते सिद्ध पीठ कहलाई । जउन चहै जन सो होई जाई ॥
जो जन यह चालीसा गावे । सब सुख भोग देवि पद पावे ॥
होहिं प्रसन्न महेश भवानी । कृपा करहु निज – जन असवानी ॥

॥ दोहा ॥
कर्हे गोपाल सुमिर मन, कामाख्या सुख खानि ।
जग हित माँ प्रगटत भई, सके न कोऊ खानि ॥

Hanuman Aarti in Hindi

Hanuman Aarti in Hindi

 

आरती कीजै हनुमान लला की।

दुष्ट दलन रघुनाथ कला की॥

जाके बल से गिरिवर कांपे।

रोग दोष जाके निकट न झांके॥

अंजनि पुत्र महाबल दाई।

सन्तन के प्रभु सदा सहाई॥

दे बीरा रघुनाथ पठाए।

लंका जारि सिया सुधि लाए॥

लंका सो कोट समुद्र-सी खाई।

जात पवनसुत बार न लाई॥

लंका जारि असुर संहारे।

सियारामजी के काज सवारे॥

लक्ष्मण मूर्छित पड़े सकारे।

आनि संजीवन प्राण उबारे॥

पैठि पाताल तो रिजम-कारे।

अहिरावण की भुजा उखारे॥

बाएं भुजा असुर दल मारे।

दाहिने भुजा संतजन तारे॥

सुर नर मुनि आरती उतारें।

जय जय जय हनुमान उचारें॥

कंचन थार कपूर लौ छाई।

आरती करत अंजना माई॥

जो हनुमानजी की आरती गावे।

बसि बैकुण्ठ परम पद पावे॥

अध्यात्म क्या है Adhyatm Kya Hai?